पृथ्वी संक्षिप्त अध्यन
  • हमलोग सौरमण्डल के अध्यन में पृथ्वी पर एक दृष्टि डाल चुके है अब इसका संक्षिप्त विश्लेषण देख लिया जाये।
  • सौरमण्डल का पृथ्वी एकमात्र ग्रह है जिसपर जीवन पाया जाता है।
  • हम पृथ्वी पर ऋतू परिवर्तन एवं दिन रात की गतिविधि को देखते है।
  • पृथ्वी पर ऋतू परिवर्तन इसके परिक्रमा के कारण होता है।
  • पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ चक्कर ल:गाती है जिसे परिक्रमण गति कहते है।
  • पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने में पूरे एक वर्ष अर्थात 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट एवं 46 सेकण्ड लगता है।
  • पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा के कारण ही ऋतू परिवर्तन होता है।
  • पृथ्वी की परिक्रमा में अतिरिक्त समय 5 घंटे 48 मिनट एवं 46 सेकण्ड लगने के कारण हर चौथे वर्ष लिपेयर अर्थात लिपवर्ष होता है जो 365 के जगह 366 दिन का होता है।
  • पृथ्वी अपने अक्ष पर घुमती है जिसे घूर्णन गति कहते है।
  • पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमने के कारण ही दिन एवं रात होती है।
  • पृथ्वी अपने अक्ष पर पश्चिम से पूरब की ओर घूमती है जिस कारण सूर्य हमेशा पूरब दिशा में निकलता है एवं पश्चिम दिशा में डूबता है।
  • पृथ्वी को अपने अक्ष पर एक घूर्णन पूरा करने में कुल 23 घंटे 56 मिनट एवं 4 सेकण्ड लगते है।
  • पृथ्वी जिस अक्ष पर घूमती है वह अपने कक्ष-तल ( Plane of the Orbit) के साथ 66.5 डिक्री का कोण बनाता है एवं
  • पृथ्वी इस तल पर लंबवत रेखा से 23.5 डिक्री झूकी हुई है।
  • पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा एक दीर्घवृत्ताकार पथ पर करती है।
  • पृथ्वी जब सूर्य की परिक्रमा करती है तब एक समय यह सूर्य से काफी दूरी पर होती है इस समय सूर्य एवं पृथ्वी के मध्य लगभग 15.21 करोड़ किलोमीटर की दूरी होती है। इस स्थिति को अपसौर कहते है। ऐसी स्थिति 4 जुलाई को होती है।
  • पृथ्वी जब सूर्य से नजदीक होती है ऐसी स्थिति को उपसौर कहते है ऐसी स्थिति 3 जनवरी को होती है इस समय पृथ्वी से सूर्य की दूरी 14.73 करोड़ किलोमीटर होती है।
  • पृथ्वी को विषवत रेखा दो बराबर भागों में विभाजित करती है।
  • विषवत रेखा के उपरी भाग जो उत्तर दिशा में होता है एवं दक्षिणी भाग दक्षिण दिशा में स्थित होता है जो उत्तरी गोलार्द्व एवं दक्षिणी गोलार्द्व कहलाता है।
  • पृथ्वी पर बने अक्षांश रेखा जो 23.5 डिक्री उत्तर में होता है कर्क रेखा कहलाता है एवं जो 23.5 डिक्री दक्षिण में होता है मकर रेखा कहलाता है।
  • हमें पता है कि पृथ्वी पर सूर्य की किरणे एक समान नहीं पडती है यह किसी गोलार्द्व में अधिक तो किसी गोलार्द्व में कम पडती है।
  • बर्ष के प्रत्येक साल 21 जून को सूर्य की किरणे पृथ्वी के कर्क रेखा पर सीधी पडती है जिससे उत्तरी गोलार्द्व में सूर्य ज्यादा समय तक दिखता है दिन बडीं एवं रात छोटी होती है।
  • पृथ्वी पर उत्तरी गोलार्द्व में गरमी ज्यादा पडती है और इस समय ईधर ग्रीष्मकालिन समय होता है।
  • इसी तरह दक्षिणी गोलार्द्व में रात लंबी दिन छोटा होता है।
  • उत्तरी गोलार्द्व के अपेक्षा दक्षिणी गोलार्द्व में सर्दी अधिक पडती है। इस स्थिति को कर्क संक्रांति कहा जाता है।
  • पृथ्वी पर कर्क संक्रांति के विपरीत मकर संक्रांति होती है।
  • प्रत्येक वर्ष 22 दिसंबर को पृथ्वी के 23.5 डिक्री दक्षिणी गोलार्द्व पर अर्थात मकर रेखा पर सूर्य की किरणे सीधी पडती है जिससे दक्षिणी गोलार्द्व में दिन बडी एवं रात छोटी होती है ठिक इसके उलट उत्तरी गोलार्द्व में राते बडी एवं दिन छोटी होती है।
  • इस स्थिति को मकर संक्रांति कहा जाता है।
  • पृथ्वी पर प्रत्येक वर्ष दो बार ऐसी स्थिति आती है कि सूर्य की किरणे भूमध्य रेखा अर्थात विषुवत रेखा पर सीधी पडती है ऐसे समय उत्तरी गोलार्द्व एवं दक्षिणी गोलार्द्व में दिन एवं रात बराबर होती है।
  • यह समय वर्ष में 21 मार्च एवं 23 सितम्बर को आती है।
  • पृथ्वी पर एक घटना घटित होती है जिसे ग्रहण कहा जाता है।
  • ग्रहण मुख्यतः दो होती है जिसे एक ग्रहण को सूर्य ग्रहण एवं दूसरे ग्रहण को चँद्रग्रहण कहा जाता है।
  • सूर्य ग्रहण कभी भी दिन में होता है जबकि चँद्रग्रहण रात में होती है।
  • यह हमें पूर्व से ज्ञात है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है एव चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करती है। जब परिक्रमा करते हुए तीनों एक दिशा में आ जाते है और सूर्य एवं पृथ्वी के बीच चंद्रमा होता है जिससे सूर्य की प्रकाश पृथ्वी पर नहीं पहुंच पाती ऐसी स्थिति को सूर्य ग्रहण कहते है। सूर्य ग्रहण जब भी लगेगा तो अमावस्या होगी। सूर्य ग्रहण के समय ऐसी स्थिति भी होती है कि सूर्य का एक भाग छिपता है जबकि कुछ भाग दिखता है यह स्थिति आशिंक सूर्य ग्रहण कहलाती है जबकि एक समय ऐसा आता है कि सूर्य पूरी तरह छुप जाता है ऐसी स्थिति पूर्ण सूर्य ग्रहण कहलाता है।
  • परिक्रमा करते हुए जब सूर्य और चंद्रमा के बीच पृथ्वी आ जाती है उस समय सूर्य का प्रकाश चंद्रमा पर नहीं पड़ता और पृथ्वी से चंद्रमा दिखना अवरूद्द हो जाता है ऐसी स्थिति को चँद्रग्रहण कहा जाता है। चँद्रग्रहण हमेशा पूर्णिमा की रात ही होती है। पृथ्वी जब चंद्रमा को पूर्णतः ढक लेती है ऐसी स्थिति पूर्ण चँद्रग्रहण एवं जब आशिंक ढकती है तो आशिंक चँद्रग्रहण कहा जाता है।
पृथ्वी की काल्पनिक रेखाएं 
  • अध्धयन की दृष्टि से पृथ्वी पर प्रमुख रूप से दो काल्पनिक रेखा खींची गई है।
  • पृथ्वी पर जो रेखा उत्तर से दक्षिण की ओर जाती है उन्हें देशांतर एवं पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाली रेखा अक्षांश कहलाती है।
  • पृथ्वी सतह पर पूर्णतः काल्पनिक रेखा जो विषुवत रेखा के उत्तर या दक्षिण में खींची गई है। इन रेखा को कोणिय अंशों में प्रदर्शित किया जाता है। विषुवत रेखा को 0° अक्षांश कहते है। विषुवत रेखा से उत्तर की ओर जितनी रेखा खींची जाती है उन्हें उत्तरी अक्षांश एवं दक्षिण की ओर खींची गई रेखा को दक्षिणी अक्षांश कहा जाता है। ध्यान रहे की विषुवत रेखा पृथ्वी के बीचोबीच खींची गई है। विषुवत रेखा के उत्तर में 90° अक्षांश को उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिण में 90° अक्षांश को दक्षिणी ध्रुव कहा जाता है। ठीक उसी प्रकार विषुवत रेखा के उत्तरी भाग को उत्तरी गोलार्द्द एवं दक्षिणी भाग को दक्षिणी गोलार्द्द कहा जाता है।पृथ्वी पर दो अक्षांशों के बीच की दूरी 111 किलोमीटर होती है।
  • विषुवत रेखा के उत्तर में 23.5° अक्षांश को कर्क रेखा कहा जाता है जबकि 23.5° दक्षिण में अक्षांश को मकर रेखा कहा जाता है।
  • अक्षांश रेखा को पृथ्वी पर पूर्व से पश्चिम की ओर दर्शाया जाता है।
  • पृथ्वी पर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 181 है।
  • पृथ्वी पर स्थित विषुवत रेखा सबसे बडीं रेखा है जबकि उत्तर या दक्षिण की ओर क्रमानुसार रेखाओं की लम्बाई कम होती जाती है।
  • किसी भी दो अक्षांश रेखाओं के बीच के क्षेत्र को कटिबंध कहते है।
देशांतर रेखा
  • ग्लोब पर अक्षांश के भाती ही कुछ रेखा उत्तर से दक्षिण की ओर खींची गई है जो काल्पनिक रेखा है इन्हीं रेखाओं को देशांतर रेखा कहा जाता है।
  • सभी देशांतर रेखा की लम्बाई बराबर होती है।
  • देशांतर रेखाएं समानांतर नहीं होती है।
  • सभी देशांतर रेखाएं ध्रुव पर मिलती है अर्थात देशांतर रेखाएं उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक है।
  • देशांतर रेखाओं के बीच ध्रुव के पास दूरी कम होती है एवं जैसे-जैसे विषुवत रेखा के ओर बढती है देशांतरों के बीच दूरियां बढती चली जाती है एवं विषुवत रेखा पर इनके बीच की दूरी अधिकतम होती है।
  • देशांतर रेखाएं दोनों ध्रुव पर एक बिंदु से मिली होती है।
  • सभी देशांतर रेखाओं की लम्बाई समान होती है।
  • लंदन के पास ग्रीनविच वेधशाला से प्रधान देशांतर गुजरती है जिसे प्रधान याम्योत्तर माना गया है।
  • ग्रीनविच वेधशाला से गुजरने वाली देशांतर को ग्रीनविच रेखा कहा जाता है।
  • ग्रीनविच रेखा को 0° देशांतर भी कहा जाता है।
  • ग्रीनविच रेखा के बायीं ओर की रेखाएं पश्चिमी देशांतर एवं दाहिनी ओर की रेखाएं पूर्वी देशांतर कहलाती है।
  • दो देशांतर रेखाओं के बीच की दूरी को गोरे कहते है।
  • देशांतर रेखा के आधार पर ही पृथ्वी पर किसी भी स्थान के समय का पता किया जाता है।
  • पृथ्वी 24 घंटे में एक चक्कर लगाती है अर्थात 360° घुमती है।
  • इन 360° में पृथ्वी को 24 घंटा लगता है जिस आधार पर 1° दूरी तय करने में 4 मिनट का समय लगता है।
  • हमे पूर्व से जानकारी है कि पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घुमती है। इसके अनुसार पूर्व की ओर के तरफ के प्रत्येक देशांतर पर 4 मिनट समय बढता जाता है जबकि पश्चिम की ओर की प्रत्येक देशांतर पर 4 मिनट समय घटता जाता है।
समय का निर्धारण
  • पृथ्वी पर समय का निर्धारण दो तरह से किया जाता है।
  • स्थानीय समय एवं प्रमाणिक समय
  • पृथ्वी पर किसी भी स्थान पर एक स्थानीय समय बना है जो सूर्य की स्थिति के आधार पर तय किया गया है कि सूर्य निकलने का समय सुबह एवं डूबने का समय शाम का समय निर्धारित है।
  • परन्तु प्रमाणिक समय वह समय है जो 0° देशांतर से तय है।
  • प्राइम मैरिडियन के समय को विश्व के सभी देश मानक समय मानते है।
  • प्राइम मैरिडियन का समय ग्रेट ब्रिटेन का मानक समय है।
  • इस समय को ग्रीनविच मीन टाइम कहा जाता है।
  • विश्व को एक समय पद्धति में जोडने के उद्देश्य से 24 जोन में बाँटा गया है।
  • प्रत्येक जोन 15° देशांतर का है अर्थात 15 देशांतर का एक जोन है।
  • 15° देशांतर से तात्पर्य है कि एक जोन एक घंटे का है क्योंकि 1° देशांतर का अंतर 4 मिनट है।
  • प्रत्येक जोन पर मानक समय एक घंटे का फर्क होता है।
  • अगर ग्रीनविच मेरिडियन रेखा पर 12 घंटा समय प्रदर्शित है तो प्रत्येक एक जोन पूर्व में समय  एक घंटा अधिक होता जायेगा जबकि प्रत्येक एक जोन पश्चिम में एक घंटा समय कम होता जाएगा।
  • कुछ देश क्षेत्रफल में इतने बडे है कि वहा समय के लिये एक जोन से अधिक की आवश्यकता पडती है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका में सात समय जोन एवं रूस में ग्यारह जोन है।
  • भारत में 82.5° पूर्वी देशांतर जो एलाहाबाद आज प्रयागराज के निकट नैनी से गुजरती है को भारत का मानक समय माना गया है।
  • यह समय भारत में ग्रीनविच से 5 घंटा 30 मिनट आगे रहता है अर्थात जब ग्रीनविच समय में दोपहर का 12 बजता है तो यहाँ शाम के 5 घंटा 30 मिनट होता है।
  • ठिक मानक समय के साथ साथ मानक तिथि की भी जरुरत थी।
  • वाशिंगटन में 1884 में अंतर्राष्ट्रीय मेरिडियन कांफ्रेंस हुआ।
  • अंतर्राष्ट्रीय मेरिडियन कांफ्रेंस में 180° देशांतर को अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा माना गया।
  • अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा प्रशांत महासागर में उत्तर से दक्षिण तक गयी है।
  • अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा से अगर पश्चिम जाते है एक दिन बढ जाता है जबकि पूर्व आने पर एक दिन कम माना जाता है।
  • अगर अंतर्राष्ट्रीय तिथि से पूर्व की तिथि 12 है तो रेखा के पश्चिम जाते ही तिथि बदल कर 13 हो जायेगा।
कटिबंध
  • यह हम पूर्व से जानते है कि पृथ्वी पर प्रत्येक एक डिक्री पर एक अक्षांश रेखा की कल्पना किया गया है।
  • कुछ अक्षांशों को तापक्रम के आधार पर विभाजित किया गया है इन्हीं खण्डों को कटिबंध कहा जाता है।
  • उष्ण कटिबंध: बिषुवत रेखा से 30° उत्तर एवं दक्षिण के भाग को उष्ण कटिबंध कहा जाता है। उष्ण कटिबंध क्षेत्र में सूर्य वर्ष में दो बार शीर्ष पर चमकता है इस प्रकार यह क्षेत्र हमेशा गर्म रहता है।
  • उपोष्ण कटिबंध: 30° अक्षांश से 45° अक्षांश के बीच उत्तरी गोलार्द्द एवं दक्षिणी गोलार्द्द को उपोष्ण कटिबंध कहा जाता है इन क्षेत्रों में कुछ समय के लिए ताप अधिक तो कुछ समय के लिए कम रहता है।
  • शीतोष्ण कटिबंध : 45° अक्षांश से 66.5° अक्षांश के बीच उत्तरी गोलार्द्द एवं दक्षिणी गोलार्द्द के क्षेत्रों को शीतोष्ण कटिबंध कहते है इन क्षेत्रों में सूर्य कभी भी शीर्ष पर नहीं चमकता बल्कि उसकी किरणें तिरक्षी पडती है जिससे इन क्षेत्रों का तापमान हमेशा कम रहता है।
  • ध्रुवीय कटिबंध : 66.5° अक्षांश से 90°अक्षांश के मध्य दोनों गोलार्द्द में स्थित क्षेत्र को ध्रुवीय कटिबंध कहलाता है यहाँ का तापमान सबसे कम होता है एवं इन क्षेत्रों में वर्फ हमेशा जमा रहता है।
  • पृथ्वी अपने अक्ष पर निरन्तर घूमती रहती है इस अक्ष का ही किनारे को उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव के नाम से जाना जाता है।
  • पृथ्वी द्वारा सूर्य की एक परिक्रमा पूर्ण करने में 365 दिन, 5 घंटा, 48 मिनट, 46 सेकण्ड का समय लगता है। इस समय को सौर वर्ष कहते है।
  • चन्द्रमा द्वारा पृथ्वी की एक परिक्रमा पूर्ण करने में 29 दिन 12 घंटा कासमय लगता है। इस काल को चन्द्रमास कहते है।
  • प्रत्येक सौर वर्ष एक वर्ष से 6 घंटा बढ जाता है जिसे समायोजित करने के लिए प्रत्येक चौथे वर्ष को लीप वर्ष कहा जाता है इस लीप वर्ष के समय एक वर्ष 365 के नहीं होकर 366 दिन का होता है। इस एक दिन फरवरी माह में जोड दिया जाता है जैसे फरवरी महिना 28 दिन का न होकर 29 दिन का होता है।
पृथ्वी की संरचना
  • पृथ्वी की संरचना किस प्रकार है इसकी जानकारी हमें मुख्य रूप से भूकम्पीय तरंगों के आधार फर होती है।
  • पृथ्वी की बनावट के हिसाब इसे तीन भागों में बाट कर अध्यन किया जाता है।
  • पृथ्वी को जिन तीन भागों में बाटा जाता है उन्हें कहाँ जाता है- क्रस्ट, मेंटल एवं कोर।
  • पृथ्वी के उपरी भाग अथवा बाहरी भाग क्रस्ट कहलाता है।
  • क्रस्ट की मोटाई 34 किलोमीटर तक है महासागरों के नीचे 5 किलोमीटर तक ही है।
  • क्रस्ट महासागरीय भूपटल मुख्य रूप से बेसाल्ट चट्टानों से बना है।
  • क्रस्ट का महाद्वीपीय भूपटल मुख्य रूप से नीस एवं ग्रेनाइट से बना है।
  • क्रस्ट दो भागों में विभाजित है- सियाल एवं सीमा में।
  • सियाल क्षेत्र में सिलिकन एवं एलुमिना की मात्रा अधिक होती है।
  • सीमा क्षेत्र में सिलिकन एवं मैगनेशियम की मात्रा अधिक होती है।
  • क्रस्ट का औसत घनत्व 2.7 ग्राम प्रति घनसेंटीमीटर होता है।
  • क्रस्ट अथवा भूपटल की रचना में प्रमुख सामग्री आँक्सीजन 46.80%, सिलिकॉन 27.72%, एल्युमीनियम 8.13%, लोहा 5.00%, कैल्शियम 3.60%, मैग्नीशियम 2.00% पाया जाता है।
  • क्रस्ट का मेंटल से जहाँ संपर्क होता है वह मंडल मोहोरोविकिक कहा जाता है।
  • क्रस्ट और कोर के बीच स्थित भाग मेंटल कहलाता है।
  • मेंटल की मोटाई लगभग 2900 किलोमीटर है अर्थात क्रस्ट के नीचे और कोर के बीच का भाग का क्षेत्र लगभग 2900 किलोमीटर है।
  • मेंटल का भाग मुख्य रूप से बैसाल्ट चट्टानों से निर्मित है।
  • मेंटल का औसत घनत्व 3.5 ग्राम प्रति घनसेंटीमीटर से 5.5 ग्राम प्रति घनसेंटीमीटर पाया जाता है।
  • पृथ्वी का केन्द्र कोर कहलाता है।
  • कोर की मोटाई 2900 किलोमीटर से 6371 किलोमीटर के बीच है।
  • ऐसा अनुमान है कि पृथ्वी का कोर द्रव्य अवस्था में है।
  • पृथ्वी का कोर लोहा एवं निकेल के मिश्रण से बना है जिसे निफे कहा जाता है।
  • पृथ्वी के कोर का तापक्रम लगभग 2700° सेल्सियस है।
  • पृथ्वी के कोर का औसत घनत्व 13 ग्राम प्रति घनसेंटीमीटर है।
  • पृथ्वी का औसत घनत्व लगभग 5.5 ग्राम प्रति घनसेंटीमीटर है।
  • पृथ्वी के प्रति 32 किलोमीटर नीचे की ओर बढने पर 1° सेल्सियस ताप की बढोतरी हो जाती है।
  • पाइथोगोरस ने सर्वप्रथम बताया कि पृथ्वी गोल है और आकाश में लटकी हुई है।
  • पृथ्वी नारंगी सामान है, सर आइजक न्यूटन ने प्रतिपादित किया था जबकि जेम्स जीन ने नाश्पाती के जैसा बतलाया था।
स्थलमंडल
  • पृथ्वी की वह भाग जिसपर महासागर एवं महाद्वीप है और जिसे हम स्पष्ट देख पाते है स्थलमंडल कहलाता है।
  • स्थलमंडल की मोटाई महाद्वीप क्षेत्रों में 40 किलोमीटर एवं महासागर क्षेत्रों में 12 किलोमीटर से 20 किलोमीटर तक है।
  • स्थलमंडल पूरी तरह से कठोर चट्टान से निर्मित होते है।
  • निर्माण के आधार पर चट्टानों को तीन भागों में वर्गीक्रृत किया जाता है- (1) आग्नेय चट्टान, (2) अवसादी चट्टान एवं (3) रूपान्तरित चट्टान।
  • आग्नेय चट्टान ( Igneous Rock)- इसका निर्माण ज्वालामुखी से निकलने वाली लावा एवं मैग्मा के जमने से होता है।
  • आग्नेय चट्टान जीवाश्मरहित होती है।
  • आग्नेय चट्टान परतरहित, कठोर एवं रवेदार होती है।
  • आग्नेय चट्टान आर्थिक रूप रूप से सम्पन्न होती है क्योंकि मूल्यवान खनिज इन चट्टानों में पाई जाती है।
  • आग्नेय चट्टानों में मुख्य रूप से लोहा, निकिल, सीसा. ताँबा, मोग्नीज, जस्ता, सोना, क्रोमाइट, प्लैटिनम इत्यादि पाए जाते है।
  • आग्नेय चट्टान मुख्य रूप से ग्रेनाइट, पेग्माटाइट, डायोराइट,बेसाल्ट, प्यूमिस, ग्रेबो, पिचस्टोन इत्यादि है।
  • अवसादी चट्टान ( Sedimenatary Rock)- प्रकृति  के कारकों द्वारा छोटी छोटी शैले जमा होने लगती है एवं बाद के रासायनिक एवं अपरदन की प्रक्रिया द्वारा ठोस रूप में हो जाती है यही शैले अवसादी चट्टान कहलाती है।
  • अवसादी चट्टान ही परतदार चट्टान कहलाती है।
  • अवसादी चट्टान में वनस्पति एवं जीव जंतु का जीवाश्म पाया जाता है।
  • अवसादी चट्टानों में ही जीवाश्म खनिज एवं खनिज तेल पाया जाता है।
  • अवसादी चट्टान सम्पूर्ण स्थल के 75% भागों पर फैली है।
  • अवसादी चट्टानें मुख्य रूप से चूना पत्थर, बलुआ पत्थर, कांग्लोमरेट, स्लेट, शेलखरी, नमक की चट्टान इत्यादि है।
  • अवसादी लाल बलुआ पत्थर से ही आगरा का किला एवं दिल्ली का लाल किला का निर्माण किया गया है।
  • कायांतरित या रूपांतरित चट्टान ( Metamorphic Rock) – जिस चट्टान का निर्माण आग्नेय चट्टान या अवसादी चट्टान के दाब, ताप एवं अन्य रासायनिक क्रियाओं के कारण परिवर्तित होकर नये रूफ में जिस चट्टान का निर्माण होता है उन्हें ही रूपान्तरित चट्टान कहा जाता है।
  • वैसे आग्नेय चट्टान या अवसादी चट्टान जिनसे रूपांतरित होकर रूपांतरित चट्टान बना है।-
आग्नेय/ अवसादी चट्टान    –   रूपांतरित चट्टान साइनाइट                      –      नीस सपिण्ड                         –       सिस्ट ग्रेनाइट                         –        नीस ग्रेबो                             –        सरपेंटाइन चूना पत्थर                    –        संगमरमर बिटुमिनस कोयला         –         ग्रेफाइट शेल                             –          स्लेट लिगनाइट कोयला         –      एंथ्रोसाइट कोयला बेसाल्ट                        –           सिस्ट बलुआ पत्थर                 –          क्वार्टजाइट भूकंप
  • भूपटल पर होने वाली कंपन को भूकंप कहा जाता है।
  • भूगर्भशाष्त्र की वह शाखा जिसके अंतर्गत भूकंप का अध्यन किया जाता है सिस्मोलाँजी (Siesmology) कहलाता है।
  • भूकंप की तीव्रता की माप जिस पैमाना पर किया जाता है वह रिक्टर पैमाना कहलाता है।
  • भूकंप की लहरों का मापन सिस्मोग्राफ (Seismograph) नामक यंत्र से होता है।
  • भूकंप के केन्द्र के ठीक ऊपर जहाँ पर्थम बार भूकंप लहर का अनुभव होता है उस स्थल को भूकंप का अभिकेंद्र कहा जाता है।
  • भूकंप जिस बिंदु से शुरू होता है उसे भूकंप का केन्द्र कहा जाता है।
  • जापान में अन्तःसागरीय भूकंप द्वारा उत्पन्न लहरों को ही सुनामी कहा जाता है।
  • भूकंप के समय उठने वाली लहरों को भूकंपीय लहर कहते है।
  • भूकंपीय लहरों को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है- (1) प्राथमिक तरंग, (2) अनुप्रस्थ तरंग, (3) अनुदैध्र्य तरंग।
  • प्राथमिक तरंग ( Primary Waves) : प्राथमिक तरंग सभी माध्यमों अर्थात ठोस, द्रव्य एवं गैसीय पदार्थों से होकर गुजरती है। प्राथमिक तरंगों की गति सबसे तेज होती है जिस कारण यह धरातल पर सबसे पहले पहुंच जाती है। प्राथमिक तरगों के लहरों की औसत 12 किलोमीटर प्रति सेकेंड होती है।
  • अनुप्रस्थ तरंग या द्वितीय तरंग (Transverse Waves or Secondary Waves) – यह तरंग प्राथमिक तरंग के बाद उठती है इसलिए इसे द्वितीय तरंग भी कहते है। यह तरंग केवल ठोस माध्यम से गुजरती है। यह द्रव्य या गैसीय पदार्थों से नहीं गुजरती है इसलिए यह तरंग सागरों में लुप्त हो जाती है।
  • अनुदैध्र्य तरंग ( Longitudinal Waves) – यह तरंग पृथ्वी के धरातल पर भ्रमण करती है। इस तरंग का भ्रमण समय अधिक होता है। इस तरंग का वेग 3 किलोमीटर प्रति सेकेंड होता है।
ज्वालामुखी (Volcono)
  • ज्वालामुखी पृथ्वी के उपरी स्थल पर वह निकाश द्वार है जिससे पृथ्वी के भीतर आंतरिक भाग से स्थल की ओर विस्फोट रूप में लावा, भाप, राख, पदार्थ, गैंसे बाहर की ओर स्थल पर निकलती है।
  • ज्वालामुखी से निकला हुआ पदार्थ एवं लावा हवा में उड जाता है फिर वह पृथ्वी के भूपटल पर धीरे धीरे जमने लगता है एवं ठोस रूप लेता है जिसे सिंडर कहा जाता है।
  • ज्वालामुखी से मुख्य रूप से गैस, ठोस एवं लावा ही निकलती है।
  • ज्वालामुखी से निकलने वाली गैसों में जलवाष्प की मात्रा अधिक रहती है।
  • ज्वालामुखी से निकली गैसों में जलवाष्प के साथ साथ हाइड्रोजन, सल्फर डाइआक्साइड एवं कार्बन डाइआक्साइड भी होती है।
  • जब ज्वालामुखी से ठोस पदार्थ बाहर आता है तो उस ठोस पदार्थ को टेफ्रा कहा जाता है।
  • ज्वालामुखी के उद्गार के समय जो तरल पदार्थ निकलता है वह पदार्थ मैग्मा कहलाता है।
  • मैग्मा जब पृथ्वी के भूपटल पर जम जाता है तब वही मैग्मा को लावा कहा जाता है।
  • जिस लावा में सिलिका की अधिक मात्रा होती है उस लावा को एसिड लावा कहा जाता है। एसिड लावा तेजी से जमता है और बहुत दूर तक नहीं फैलता है।
  • जिस लावा में कम मात्रा में सिलिका होती है वैसे लावा को बेसिक लावा कहा जाता है। बेसिक लावा धीमे तरिका से जमता है एवं जमने तक दूर तक फैल जाता है।
  • ज्वालामुखी की सक्रियता के आधार पर तीन प्रकारों में बाटाँ गया है –
  • (1) सक्रिय ज्वालामुखी
  • (2) प्रसुप्त ज्वालामुखी एवं
  • (3) मृत या शांत ज्वालामुखी।
  • सक्रिय ज्वालामुखी ( Actvie Volcano)– यह वह ज्वालामुखी है जिसमें अक्सर बिस्फोट होते रहता है। इन ज्वालामुखी से हमेसा पदार्थ, धुल, धुआँ, गैसे इत्यादि बाहर आते रहते है।
  • सक्रिय ज्वालामुखी के कुछ प्रमुख उदाहरण है जैसे- अमेरिका के हवाई द्वीप में स्थित किलायु एवं मौनालोवा, इटली के सिसली में माउण्ट एटना, इटली के लेपारी द्वीप में स्ट्राम्बोली, अंडमान के बैरन द्वीप, अंटार्कटिका के माउण्ट इरेबस, इक्वेडोर के कोटोपैक्सी, अर्जेंटीना चिली सीमा पर ओजल डेल सालाडो इत्यादि।
  • भूमध्य सागर में सिसली के उत्तर में लिपारी द्वीप स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी है जिससे जलता हुआ गैस निकलते रहता है जिससे आस पास प्रकाश चमकते रहता है। प्रकाश से चमकने के कारण इस ज्वालामुखी को भूमध्य सागर का प्रकाश स्तम्भ कहा जाता है।
  • प्रसुप्त ज्वालामुखी (Dormant Volcano) -ऐसा ज्वालामुखी जिसमें पहले बिस्फोट हुआ है लेकिन बहुत दिनों से शांत है परन्तु बिस्फोट हो सकता है ऐसी संभावना बनी रहती है ऐसी ही ज्वालामुखी को प्रसुप्त ज्वालामुखी कहा जाता है।
  • प्रसुप्त ज्वालामुखी के कुछ प्रमुख उदाहरण है- इटली के भूमध्य सागर में स्थित विसुवियस, इंडोनेशिया में स्थित क्रांकाटोवा, जापान में स्थित फ्यूजीयामा, अंडमान में स्थित नारकोंडम, फिलीपीन में स्थित मेयन।
  • शांत ज्वालामुखी (Extinct Volcano) – वैसा ज्वालामुखी जिसमें बिस्फोट लंबें समय से नहीं हुआ एवं अब आगे होने की संभावना भी नहीं है शांत ज्वालामुखी कहलाता है।
  • शांत ज्वालामुखी के कुछ उदाहरण निम्न है जैसे – तंजानिया में स्थित किलिमंजारो, बर्मा में स्थित पोपा, ईरान में स्थित कोहसुल्तान, ईरान में स्थित देवबंद, एंडीज पर्वत पर स्थित एंकाकागुआ, दक्षिण अमेरिका में स्थित चिम्बराजो इत्यादि।
  • ज्वालामुखी में हुए बिस्फोट के बाद तक ज्वालामुखी के सुराखों से  जल एवं वाष्प निकलते रहते है जिसे गीजर ( Geyser) कहा जाता है।
  • गीजर के प्रमुख उदाहरण है संयुक्त राज्य  अमेरिका के येलोस्टोन पार्क स्थित ओल्ड केथफुल गीजर। इसमें प्रति मिनट बिस्फोट होते रहता है।
  • विश्व का सबसे ऊंचा ज्वालामुखी पर्वत इक्वाडोर में स्थित कोटापैक्सी ज्वालामुखी है जो 19613 फिट ऊंचा है।
  • आस्ट्रेलिया महाद्वीप पर ज्वालामुखी नहीं पाई जाती है आस्ट्रेलिया ज्वालामुखी रहित है।
  • विश्व में सबसे सक्रिय ज्वालामुखी एशिया महाद्वीप एंव अमेरिका के तटीय भागों में स्थित है।
  • ज्वालामुखी के अधिकांश सक्रिय भाग प्रशांत महासागर के तटीय भागों पर स्थित है।
  • प्रशांत महासागर में स्थित परिमेखला को अग्नि वलय कहा जाता है।
पृथ्वी के स्थल का निर्माण
  • पृथ्वी के स्थल के निर्माण के आधार पर पृथ्वी को तीन  प्रकारों में विभाजित किया जाता है- (1) पर्वत,(2) पठार एवं (3) मैदान।
  • पर्वत( Mountain) – पृथ्वी का वह भाग जो आस पास के स्थल में अधिक ऊंचा हो पर्वत कहलाता है।
  • पर्वत अकेले ऊंचा हो सकता है या श्रृंखला में भी हो सकता है।
  • निर्माण के आधार पर पर्वत को विभिन्न रूप में विभाजित किया जा सकता है।
  • वलित पर्वत ( Folded Mountain ) – वैसे चट्टान जो पृथ्वी के आंतरिक शक्तियों मुड जाते है ऐसे निर्मित पर्वत को मोडदार पर्वत या वलित पर्वत कहा जाता है।इन पर्वतों को लहरदार पर्वत भी कहा जाता है। वलित पर्वत का कुछ उदाहरण निम्न है- एशिया में हिमालय, आस्ट्रेलिया का ग्रेट डिवाइडिंग रेंज, अफ्रीका का एटलस, यूरोप का आल्पस पर्वत, उतरी अमेरिका का राँकी पर्वत, दक्षिण अमेरिका का एण्डिज पर्वतमाला।
  • ज्वालामुखीय पर्वत ( Volcanic Mountain) – लावा के जमने से जो पर्वत का निर्माण होता है वैसे पर्वत को ज्वालामुखीय पर्वत कहा जाता है। इस पर्वतमाला के उदाहरण है- संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित माउंट रेनियर, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित हुड, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित शास्ता, अफ्रीका में स्थित किलिमंजारो, इक्वेडोर में स्थित कोटोपेक्सी, जापान में स्थित फ्यूजीयामा, चिली में स्थित एकांकागुआ।
  • ब्लॉक पर्वत (Block Mountain) – वैसे पर्वतमाला जिनके दो भाग उठे हुए हो मध्य भाग धँसा हुआ हो ऐसे पर्वत को ब्लॉक पर्वत कहा जाता है। ऐसे पर्वत के चट्टानों में भ्रंश के कारण मध्य का भाग धँस जाता है। चट्टान के मध्य के धँसें हुए भाग को रिफ्ट घाटी कहा जाता है। ब्लॉक पर्वत के उदाहरण निम्न है- कैलेफोर्निया में स्थित सियरा नेवादा, जर्मनी में स्थित ब्लैक फारेस्ट, फ्रांस में स्थित वासजेज, पाकिस्तान में स्थित साल्ट रेंज।
  • संचित पर्वत (Accumulated Mountain) – पृथ्वी के उपर पत्थर, बालू, कंकड, मिट्टी के जमा होने के कारण जो पर्वत का निर्माण हो जाता है उसे ही संचित पर्वत कहा जाता है। संचित पर्वत रेगिस्तानी क्षेत्रों में बनने वाले बालू के टीला होते है।
  • गुम्बदाकार पर्वत ( Domed Mountain) – पृथ्वी के धरातल पर कुछ भाग का शिर्ष काफी ऊंचा उठ गया होता है जो गुम्बद की तरह दिखता है उसे ही गुम्बदाकार पर्वत कहा जाता है। गुम्बदाकार पर्वत के उदाहरण है- संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित हेनरी पर्वत, ब्लैक पहाड़ी इत्यादि।
  • अवशिष्ट पर्वत( Residual Mountain) – वैसे पर्वतमाला जो अपरदन के प्रक्रिया के फलस्वरूप निर्मित होते है अवशिष्ट पर्वत कहे जाते है। अवशिष्ट पर्वत के उदाहरण है- भारत में स्थित राजस्थान के अरावली पर्वत, भारत में ही स्थित मध्यप्रदेश के सतपुडा पर्वत एवं विंध्याचल पर्वत इत्यादि।
  • विश्व की सर्वाधिक लंबी पर्वत श्रृंखला एण्डीज पर्वत है जो 7000 किलोमीटर लंबी फैली है।
  • राँकी पर्वत की लंबाई 4800 किलोमीटर है वही एशिया की हिमालय पर्वतमाला की लंबाई 2500 किलोमीटर तक है।
पठार (Plateau) पृथ्वी के धरातल का वह हिस्सा जो अपने आस पास के क्षेत्रों से ऊंचा हो परन्तु पर्वत के तरह शिर्ष खडा न होकर सपाट एंव चौडा हो पठार कहलाते है। सामान्यतः पठारों की ऊंचाई 500 किलोमीटर तक होती है परन्तु कुछ पठार अधिक ऊंचे है जैसे – बोलीविया का पठार 11800 किलोमीटर ऊंचा, कोलंबिया का पठार 7800 किलोमीटर ऊंचा, तिब्बत का पठार 2000 किलोमीटर ऊंचा है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका का पीडमाण्ट पठार मैदानी भाग से भी नीचे है।
  • पर्वतमालाओं के मध्य बने पठार को अन्तर्पवर्तीय पठार कहा जाता है।
  • पृथ्वी के भूपटल लैकोलिथ के अपरदन के कारण जब उभर जाते है तो उसे ही महाद्वीपीय पठार कहा जाता है।
  • पर्वतमाला एंव मैदानी भागों के मध्य उठे हुए समतल भाग को पर्वतपदीय पठार कहा जाता है।
  • समुद्र के तटों पर स्थित वैसे सपाट भाग जो मैदानों से ऊंचा हो तटीय पठार कहलाता है।
मैदान (Plains)
  • पृथ्वी के स्थलमंडल का वह भाग जो सपाट समतल हो मैदान कहा जाता है।
  • निर्माण के अनेकों प्रकार से मैदानों के प्रकार भी अनेक है।
  • नदी एवं पवन द्वारा अपरदन से निर्मित मैदान को अपरदनात्मक मैदान कहा जाता है।
  • हवा द्वारा उड कर आई हुई मिट्टी एवं बालू के धूलकणों द्वारा निर्मित मैदान को लोएस मैदान कहा जाता है।
  • वैसे मैदान जो नदियों के अपरदन से समुद्र तल के निकट निर्मित होता है समप्राय मैदान कहलाता है।
  • हिम के जमाव द्वारा निर्मित मैदान को ग्लेशियर मैदान कहा जाता है। यह मैदान दलदल होता है एवं यहा फर वन पाया जाता है।
  • चूने पत्थरों की चट्टानों के घुलने से जिस मैदान का निर्माण होता है वह मैदान कास्र्ट मैदान कहलाता है।
  • नदियों के निक्षेपन द्वारा बडे मैदानों का निर्माण होता है जिसे निक्षेपात्मक मैदान कहा जाता है। निक्षेपात्मक मैदानों में सतलज, गंगा, ह्वाग्ंहो, मिसी सिपी के मैदान शामिल है। निक्षेपात्मक मैदानों में डेल्टा का मैदान, जलोढ का मैदान प्रमुख है।
वन(Forest)
  • निर्माण के आधार पर वन की भी अनेकों प्रकार है।
  • ऊष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन ( Tropical Evergreen rain forest)- जिस स्थान पर 200 सेंटीमीटर से अधिक बर्षा होती है उन स्थलों पर पाये जाने वाले वन ऊष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन कहलाते है। ये वन ऊष्ण कटिबन्धीय प्रदेश एवं विषुवत रेखीय प्रदेशों में पाये जाते है। इन वनों में पाये जाने वाले पेडों की पत्तियाँ चौडे होती है।
  • ऊष्ण कटिबन्धीय अर्ध पतझड वन ( Tropical Semi Deciduous forest) – ये वन उन क्षेत्रों में पाए जाते है जहाँ बर्षा 150 सेंटीमीटर से कम होती है। ऐसे वनों में सागवान, साल एवं बाँस इत्यादि पाए जाते है।
  • विषुवत रेखीय वन – इन क्षेत्रों के वन के प्रमुख पेड जैतुन, काँर्क, ओक इत्यादि है। इन क्षेत्रों में  वृक्ष एवं झाडिया दोनों पाए जाते है।
  • टैगा वन- ये वन सदाबहार होते है। इन क्षेत्रों के वनों की पत्तियाँ नुकीली होती है।
  • टुण्ड्रा वन- यह क्षेत्र बर्फ से ढका रहता है। इन क्षेत्रों में गर्मी मे लाइकेन एवं माँस उगते है।
  • पर्वतीय वन- इन क्षेत्रों में शंकुधारी वृक्ष पाए जाते है जिनकी पत्तियाँ चौडी होती है।
  • पृथ्वी के भूपटल पर वन के अतिरिक्त घास भी पाऐ जाते है।
  • घास के प्रकार के आधार पर घास भूमियों का दो प्रकार में बाँटा जाता है।
  • ऊष्ण कटिबंधीय घास भूमि जो एक प्रकार की घास भूमि है। इस भूमि को विभिन्न देशों में विभिन्न नामों से जानते है। जैसे- ब्राजील में कम्पोज घास मैदान, अफ्रीका में सवाना घास मैदान,बेनेजुएला में लानोस घास मैदान, कोलम्बिया में लानोस घास मैदान।
  • शीतोष्ण कटिबंधीय घास भूमि जो एक दूसरे प्रकार की घास मैदान है। इस मैदान को विभिन्न देशों में विभिन्न नामों से जाना जाता है। जैसे- संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रेयरी, कनाडा में प्रेयरी, अर्जेन्टीना में पम्पास, आस्ट्रेलिया में डाउन्स, न्यूजीलैंड में डाउन्स, दक्षिण अफ्रीका में वेल्ड, एशिया में स्टेपी इत्यादि।
पृथ्वी पर निर्मित विभिन्न स्थलाकृतियाँ
  • पृथ्वी पर कुछ ऐसी स्थलाकृति बनती है जो नदी, हिमनदी, भूमिगत जल, पवन, तटीय, सागरीय जल, समुन्द्री तरंग इत्यादि से निर्मित होती है।
  • नदी द्वारा निर्मित स्थलाकृति निम्न है। जैसे- गार्ज, कैनियन, जलोढ पंख, जल प्रपात, नदी विसर्प, जलगर्तिका, नदी वेदिका, छाडन झील, तटबन्ध, डेल्टा इत्यादि।
  • पवन द्वारा निर्मित स्थलाकृति निम्न है। जैसे- ज्यूगेन, इन्सेलबर्ग, लोयस, यारडंग, बरखान, वातागर्त, छत्रकशिला, भूस्तम्भ, प्लेया, बरखान, लैगून इत्यादि।
  • हिमनदी द्वारा निर्मित स्थलाकृति निम्न है। जैसे-  अरेट, सर्क, एरीट, टार्न, हार्न, फियोर्ड, केम, ड्रमलिन, नुनाटक, श्रृंग, लटकती घाटी, कोल, यू आकार घाटी, एस्कर इत्यादि।
  • भूमिगत जल द्वारा निर्मित स्थलाकृति निम्न है। जैसे- उत्स्रुत कुआँ, कास्र्ट झील, गीजर, लैपीज, युवाला, कन्दरा, घोल रंध्र, स्टैलेक्टाइट्स, स्टैलेग्माइट, डोलाइन, पोल्जे, कन्दरा इत्यादि।
  • तटीय क्षेत्रों में निर्मित स्थलाकृति निम्न है। जैसे- तटीय कन्दरा, पुलिन, तटीय क्लिफ, स्टैक, टोम्बोलो इत्यादि।
  • सागरीय जल द्वारा निर्मित स्थलाकृति निम्न है। जैसे- सर्फ, लूप, पुलिन, टोम्बोलो, वेला चली, हुक, तंगरिका इत्यादि।
  • समुंद्री तरगों द्वारा निर्मित स्थलाकृति निम्न है। जैसे- लैगून झील, समुंद्री भृगु, स्टैक, डाल्मेशियन, भुजिह्वा, रिया तट इत्यादि।
  • भूमिगत जल द्वारा निर्मित उत्स्रुत कुआँ अधिक रूप से आस्ट्रैलिया में पाये जाते है।
  • समुंद्री तरंग द्वारा निर्मित स्थलाकृति डाल्मेशियन युगोस्लाविया के तट पर पाये जाते है।
  • समुंद्री तरंग द्वारा निर्मित स्थलाकृति रिया तट भारत के पश्चिमी तट पर पाये जाते है।
Scroll to top
error: Content is protected !!