वायुमंडल
- पृथ्वी के चारों तरफ बहुस्तरीय गैसीय आवरण फैला हुआ है जिसे वायुमंडल कहा जाता है।
- वायुमंडल के अध्यन के लिए वायुमंडल के भाग को दो परतों में बाँटा गया है।
- वायुमंडल की निचली परत के अध्यन के विज्ञान को ऋतू विज्ञान ( Meteorology) कहा जाता है।
- वायुमंडल की ऊपरी परत के अध्यन के विज्ञान को वायुर्विज्ञान (Aerology) कहा जाता है।
- वायुमंडल में पृथ्वी के सतह से 80 किलोमीटर ऊपर तक विभिन्न गैसों का मिश्रण पाया जाता है जिनमें से कुछ इस प्रकार है जैसे- नाइट्रोजन गैस 78.07%, आँक्सिजन गैस 20.93%, आँरगन गैस 0.93%, कार्बन डाइआक्साइड गैस 0.03% इत्यादि।
- पृथ्वी की सतह से 15 किलोमीटर की ऊचाई से 35 किलोमीटर की ऊचाई तक ओजोन परत पाई जाती है।
- ओजोन परत सूर्य से निकलने वाली पराबैगनी को अवशोषित करती है।
- पराबैंगनी किरण से कैंसर जैसी घातक बिमारी हो सकती है।
- ओजोन परत को क्लोरोफ्लोरोकार्बन, नाइट्रोजन्स आक्साइड, हैलोजन्स इत्यादि से काफी क्षति पहुंच रहीं है।
- वायुमंडल में स्थित कार्बन डाइआक्साइड एवं जलवाष्प पृथ्वी की तापक्रम को बनाए रखता है।
- वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा 0 से 4% तक होती है।
- वायुमंडल की सबसे अधिक परिवर्तनशील गैस जलवाष्प है।
- जलवाष्प कार्बन डाइआक्साइड की तरह ही ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करता है।
- वायुमंडल में विधमान धूलकण के कारण सूर्य की किरणों का परावर्त्तन एवं प्रकीर्णन होता है।
वायुमंडल की संरचना
वायुमंडल को तापमान की दृष्टि से विभिन्न परतों में विभाजित किया गया है जैसे-
- झोभमंडल
- समतापमंडल
- मध्यममंडल
- आयनमंडल
- बहिर्मंडल
1) झोभमंडल ( Troposphere)
- यह वायुमंडल की सबसे निचली परत है।
- इसकी ऊचाई पृथ्वी से 8 किलोमीटर से 18 किलोमीटर के बीच है।
- झोभमंडल की ऊचाई ध्रुवों पर 8 किलोमीटर होती है परन्तु विषुवत रेखा पर 18 किलोमीटर होती है।
- झोभमंडल में प्रत्येक 165 मीटर ऊचां जाने पर 1° तापमान में कमी होती जाती है।
- झोभमंडल में सभी मौसमी बदलाव होती है जिस कारण यह मंडल परिवर्तन मंडल भी कहलाता है।
- झोभमंडल में ही मुख्य वायुमंडल की घटनायें जैसे आँधी, बादल, वर्षा की भी होती है।
- झोभमंडल की सीमा में ही सभी संवहन धाराएं सीमित रहती है जिस कारण यह मंडल संवहनमंडल भी कहलाता है।
2) समतापमंडल( Stratosphere)
- समतापमंडल की ऊचाई पृथ्वी की सतह से 18 किलोमीटर से 50 किलोमीटर के बीच आंकी जाती है।
- समतापमंडल की ऊचाई विषुवत रेखा पर 18 किलोमीटर एवं ध्रुवों पर लगभग 50 किलोमीटर होती है।
- समतापमंडल के निचले भाग में तापमान स्थिर पाया जाता है।
- समतापमंडल में मौसम से जुडी कोई घटना नहीं घटती है जिससे यह मंडल वायुयान की उडानों के लिए आदर्श माना जाता है।
- समतापमंडल के निचले भाग में कभी कभी मुक्ताभ मेघ ( Motter of peal claud) विकसित होता है।
- समतापमंडल में ही 18 किलोमीटर से 35 किलोमीटर के बीच ओजोन परत पाई जाती है।
- ओजोन परत ही सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों का अवशोषण करती है।
- ओजोन परत में ऊचाई के साथ ऊपर जाने पर तापमान बढता जाता है।
- ओजोन परत में प्रति 1 किलोमीटर की ऊचाई पर जाने पर 5° सेन्टीग्रेड की वृद्धि तापमान में होती जाती है।
3) मध्यममंडल(Mesosphere)
- मध्यममंडल की ऊचाई 50 किलोमीटर से 80 किलोमीटर के बीच आंकी जाती है।
- मधयममंंडल में ऊपर की ओर जाने पर तापमान में गिरावट आती है।
- मध्यममंडल की ऊपरी सीमा को मेसोपाँज कहा जाता है।
- मेसोपाँज के ऊपर बढने पर तापमान फिर से बढने लगता है।
4) आयनमंडल( Ionosphere)
- आयनमंडल की ऊचाई पृथ्वी की सतह से 80 किलोमीटर से लेकर 640 किलोमीटर होती है।
- आयनमंडल में जितना ऊंचा बढते है उतना तापमान में वृद्धि होते जाती है।
- आयनमंडल में रेडियो तरंगों का परावर्तन होता है।
- आयनमंडल में विध्युत चुंबकीय कण पाया जाता है।
- आयनमंडल पराबैंगनी किरणों द्वारा आयनीकृत होते रहता है।
- आयनमंडल में वायुदाब कमजोर होता है।
- आयनमंडल में ऊचाई के साथ कई परतें पाई जाती है, जैसे- D,E,F एवं G परत।
- D परत सबसे निचली परत होती है। यह परत निम्न आवृत्ति की रेडियो तरंगों को परावर्तित करती है।
- E परत D परत की ऊपरी परत होती है। इस परत को केनली हेवीसाइड परत कहा जाता है। यह परत मध्यम आवृत्ति वाली रेडियो तरंगों एवं ऊच्च आवृत्ति वाली रेडियो तरंगों को परावर्तित करती है।
- F परत E परत के ऊपर पायी जाती है। यह परत अप्लीटन परत कहलाती है। यह परत भी मध्यम आवृत्ति वाली रेडियो तरंगों एवं ऊच्च आवृत्ति वाली रेडियो तरंगों को परावर्तित करती है।
- G परत आयनमंडल की सबसे ऊपरी परत है इसकी ऊचाई 400 किलोमीटर से लेकर 640 किलोमीटर के बीच होती है।
5) बहिर्मंडल ( Exosphere)
- बहिर्मंडल की ऊचाई 640 किलोमीटर से ऊपर है।
- बहिर्मंडल के ऊपर का किसी भी सीमा का निर्धारण नहीं किया गया है।
- बहिर्मंडल में हाइड्रोजन गैस एवं हीलियम की प्रधानता रहती है।
सूर्याताप( Insolation)
- सूर्य से पृथ्वी की ओर प्रवाहित होने वाली सौर्यिक ऊर्जा या विकीर्ण ऊर्जा को ही सूर्याताप कहा जाता है।
- पृथ्वी के किसी भी विशेष स्थान के औसत तापक्रम एवं उसके अक्षांश के औसत तापक्रम का अंतर तापीय विसंगति कहलाता है।
- पृथ्वी सूर्य की कुल ऊर्जा का दो अरब भाग ही प्राप्त कर पाती है।
- जिस किसी भी तापक्रम पर कोई वायु संतृप्त हो जाती है वह तापक्रम उस वायु का ओसांक (dew point)कहलाता है।
- पृथ्वी पर ओस पडने के लिए वायु का ओसांक 0° सेन्टीग्रेड से ऊपर होना चाहिए।
- वायुमंडल की ऊपरी सतह पर पृथ्वी औसत रूप से 1.94 कैलोरी प्रति वर्ग सेंटीमीटर प्रतिमिनट ऊर्जा प्राप्त करती है।
- वायु पृथ्वी के संपर्क के कारण गर्म होकर जब वायुमंडल में ताप का संचरण करती है तो यह प्रक्रिया संवहन कहलाती है।
- जब पृथ्वी पर किसी विशेष स्थान पर प्राप्त होने वाला सूर्यताप की मात्रा एवं उसी स्थान से परावर्तित की जाने वाली सूर्यताप की मात्रा के बीच के अनुपात को एल्डिबो कहा जाता है। पृथ्वी का एल्डिबो 0.30% है अर्थात पृथ्वी से सूर्यताप का 30% वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर जाता है।
- सूर्यताप एवं परावर्तित सौर विकिरण में संतुलन के कारण पृथ्वी का औसत तापक्रम एक समान पाया जाता है यह संतुलन ऊष्मा बजट कहलाता है।
समताप रेखा ( Isotherms)
- पृथ्वी पर विधमान वह काल्पनिक रेखा जो समान तापमान वाले स्थानों को मिलाती है समताप रेखा कही जाती है।
- समताप रेखाएं सीधी होती है परन्तु समुद्र के तट पर झुकाव पाया जाता है।
- गर्मी के समय में स्थल से सागर की ओर जाने वाली समताप रेखा विषुवत रेखा की तरफ एवं सर्दी के समय ध्रुवों की तरफ मुड जाती है।
- विश्व के अधिकतर क्षेत्रों में जनवरी महिने को न्यूनतम तापमान एवं जुलाई महिने को अधिकतम तापमान वाला महिना माना जाता है, इसी कारण तापमान विश्लेषण के लिए इन्हीं महीनों को चुनाव किया जाता है।
वायुमंडलीय दाब एवं पवन संचार
- पृथ्वी पर वायुमंडल द्वारा जो भार डाला जाता है, वह वायुदाब कहलाता है।
- वायुदाब को जिस यंत्र से मापा जाता है, उसे बैरोमीटर कहा जाता है।
- वायुमंडलीय दाब की मात्रक इकाई को बार कहा जाता है।
- समुद्र तल पर समान वायुदाब वालें क्षेत्रों को मिलाने वाली रेखा को समदाब रेखा कहा जाता है।
- दाब प्रवणता को समदाब रेखा ही दर्शाती है।
- दूरी की प्रति इकाई पर दाब के घटने की दर दाब प्रवणता कहलाती है।
- संपूर्ण पृथ्वी के भूपटल पर वायुदाब के चार कटिबंध पाए जाते है। जैसे- (1) विषुवत रेखीय निम्न वायुदाब (2) उपोष्ण उच्च वायुदाब (3) उपध्रुवीय निम्न वायुदाब (4) ध्रुवीय उच्च वायुदाब।
- (1) विषुवत रेखीय निम्न वायुदाब- विषुवत रेखा के उत्तर एवं दक्षिण दोनो तरफ 10° उत्तरी अक्षांश एवं 10° दक्षिणी अक्षांश तक निम्न दाब की मेखला होती है। विषुवत रेखा पर पुरे साल सूर्य की किरणें सीधी पडती है और यहाँ दिन रात बराबर होते है, जिससे यहाँ का तापमान अधिक रहता है, इस कारण हवाएं ऊपर की तरफ उठती है और यहाँ निम्न वायुदाब बना रहता है।यहाँ निम्न वायुदाब के कारण हवाओं की गति कम एवं वातावरण शांत रहता है जिस कारण इस कटिबंध को शांत कटिबंध या डोलड्रम (Doldrum) की पेटी कहते है।
- (2) उपोष्ण उच्च वायुदाब- उपोष्ण उच्च वायुदाब दोनों गोलार्द्वों में 30° -35° अक्षांशों के बीच में स्थित है। इस क्षेत्र में लगभग बर्षभर उच्च वायुदाब बना रहता है। इस उच्च वायुदाब वाली पेटी को ही अश्व अक्षांश कहाँ जाता है।
- (3) उपध्रुवीय निम्न वायुदाब -दोनों गोलार्द्वों में 45° अक्षंशों से 66.5° अक्षांशों के बीच पायी जाने वाली पेटी है। यह पेटी भी गति जनित है।
- (4) ध्रुवीय उच्च वायुदाब- ध्रुवों के पास निम्न तापमान रहता है जिस कारण यहाँ पर वायुदाब उच्च पाया जाता है। अतः यह पेटी उच्च वायुदाब तापजन्य होता है।
- पृथ्वी पर दक्षिणी गोलार्द्व में 40° अक्षांश से 60° अक्षांश के बीच काफी तेज हवाएं चला करती है जिसमे गरज भी काफी होती है, इस हवा को गरज चालीसा (Roaring forties) कहा जाता है। फेरल का पवनों की दिशा उत्तरी गोलार्द्व में अपी दाहिनी ओर विक्षेपित हो जाती है जबकि दक्षिणी गोलार्द्व में अपनी बायीं ओर विक्षेपित हो जाती है, इस नियम को फेरल का नियम कहाँ जाता है।
- पवन की दिशा जिस बल के कारण बदलती है, उस बल को कोरिआँलिस बल कहाँ जाता है।
पवन(Wind)
- पृथ्वी के सतह पर वायुदाब में भिन्नता पाई जाती है जिस कारण वायु में गति पाई जाती है यही वायु की गति को पवन कहा जाता है।
- ऊर्ध्वाधर दिशा में गतिशील हवा वायुधारा कहलाती है।
- पवन की प्रवाह जब भी भी होता है यह उच्च दाब से निम्न दाब की तरफ होता है।
- पवन की गति दाब की प्रवणता निर्भर करती है।
- बाइस बैलेट के नियम के अनुसार कोई व्यक्ति हवा की दिशा में मुँह करके खडा हो जाए तो उत्तरी गोलार्द्व में निम्न वायुदाब बायीं तरफ होता है जबकि दक्षिणी गोलार्द्व में निम्न वायुदाब दाहिनी तरफ होता है।
पवन के प्रकार
- पृथ्वी पर कई प्रकार की पवने पाई जाती है।
- प्रचलित पवन ( Prevailing Wind)- वायुदाब के एक अक्षांश के दूसरे अक्षांश से अंतर के कारण एक कटिबंध से दूसरे कटिबंध की तरफ पुरे वर्ष लगातार बहनें वाली पवन को प्रचलित पवन कहाँ जाता है।
- प्रचलित पवन को हो स्थाई पवन या भूमंडलीय पवन भी कहाँ जाता है।
- प्रचलित पवन भी तीन प्रकार की होती है, जैसे- पछुवा पवन, व्यापारिक पवन एवं ध्रुवीय पवन।
- उपोष्ण उच्च वायुदाब कटिबंधों से निम्न वायुदाब वाली उपध्रुवीय कटिबंधों की तरफ चलने वाली स्थायी हवा को पछुआ पवन कहाँ जाता है।
- पछुआ पवन उत्तरी गोलार्द्व में दक्षिण पश्चिम दिशा से उत्तर पूर्व की दिशा में बहती है जबकि दक्षिणी गोलार्द्व में उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूर्व दिशा की तरफ बहती है।
- पछुवा पवन की तीव्र गति 40° अक्षांश से 60° अक्षांश के बीच पाया जाता है, इन अक्षांशों के बीच बहने वाली पवन को गरजता चालीसा, प्रचण्ड पचासा एवं चिखता साठा कहाँ जाता है।
- व्यापारिक पवन- उपोष्ण उच्च वायुदाब कटिबंध की तरफ से विषुवत रेखीय निम्न वायुदाब कटिबंध की तरफ दोनों गोलार्द्वों में जो पवन वर्ष भर निरंतर प्रवाहित होते रहता है व्यापारिक पवन कहलाता है।
- व्यापारिक पवनें 30° से 50° उत्तरी अक्षांश एवं दक्षिणी अक्षांश के बीच प्रवाहित होती रहती है।
- काँरिआँलिस बल एवं फेरल के नियम के कारण व्यापारिक पवनें उत्तरी गोलार्द्व में उत्तर- पूर्वी दिशा में तथा दक्षिणी गोलार्द्व में दक्षिण – पूर्वी दिशा में प्रवाहित होती है इसी कारण व्यापारिक पवन को पूर्वा पवन भी कहाँ जाता है।
- ध्रुवीय पवन- ध्रुवीय उच्च वायुदाब कटिबंध से ध्रुवीय निम्न वायुदाब कटिबंध की तरफ प्रवाहित होने वाली पवन को ध्रुवीय पवन कहा जाता है। ध्रुवीय पवनें दोनों गोलार्द्वों में ध्रुवों से 65° अक्षांश तक होता है। उत्तरी गोलार्द्व में यह पवन उत्तर- पूर्व से दक्षिण- पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है जबकि दक्षिणी गोलार्द्व में दक्षिण- पूर्व से उत्तर- पश्चिम की तरफ प्रवाहित होती है।
सामयिक पवन( Seasonal Wind)
- मौसम या समय के अनुसार जिन पवनों की दिशा बदल जाया करती है, वह सामयिक पवन कहलाती है। सामयिक पवन को मौसमी पवन भी कहा जाता है।
- सामयिक पवन को मुख्य रूप से पाँच भागों में बाँटा जाता है, जैसे- मौनसूनी पवन, समुद्री समीर, स्थलीय समीर,घाटी समीर, पर्वत समीर।
- मौनसूनी पवन- मौनसूनी पवनें मौसम में परिवर्तन के अनुसार दिशा बदल कर बहती रहती है। गर्मी के दिनों में स्थल पर अधिक तापमान से स्थल गर्म हो जाता है जिससे स्थल पर निम्न वायुदाब रहता है और हवा समुद्र से स्थल की ओर बहने लगती है, जो ग्रीष्मकालीन मौनसूनी पवन कहलाती है। जबकि ठिक इसके उलट शीत ऋतू में स्थल ठंडी रहती है तो उच्च वायुदाब के कारण हवा स्थल से समुद्र की ओर बहने लगती है जिसे शीतकालीन मौनसूनी पवन कहा जाता है। मौनसूनी पवनें भारत के साथ- साथ, बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, बंगाल की खाडी, अरब सागर, दक्षिण-पूर्वी एशिया, उत्तरी आस्ट्रेलिया में बहा करती है।
- समुद्र समीर- जब दिन में स्थल भाग पर तापमान बढ जाता है जिससे स्थल भाग पर निम्न वायुदाब उत्पन्न हो जाता है एवं समुद्र पर कम तापमान के कारण उच्च वायुदाब उत्पन्न होता है फलस्वरूप दिन में पवनें समुद्र से स्थल की ओर बहती है जिसे समुद्र समीर कहा जाता है।
- स्थलीय समीर- रात्रि के समय जब स्थल भाग अतिशीघ्रता से ठंडा हो जाता है एवं स्थलीय भाग पर उच्च वायुदाब उत्पन्न हो जाता है और समुद्र पर निम्न वायुदाब उत्पन्न हो जाता है, फलस्वरूप रात्रि के समय पवनें स्थल से समुद्र की ओर बहने लगती है जिसे स्थलीय समुद्र कहा जाता है।
- घाटी समीर – पर्वतीय क्षेत्रों में दिन में पर्वत पर सूर्य की प्रकाश पडती है जिससे पर्वत अधिक गर्म हो जाता है जिससे निम्न वायुदाब बन जाता है जबकि घाटी तल में प्रकाश नहीं पडने से उच्च वायुदाब बन जाता है जिसके कारण दिन के समय पवनें घाटी की ओर से पर्वतीय शिखर की ओर बहने लगती है, जिसे घाटी समीर कहा जाता है।
- पर्वत समीर- जब रात्रि का समय होता है तो घाटी के अपेक्षा पर्वतीय शिखर सूर्य से प्रकाश नहीं प्राप्त होने के कारण अधिक ठंडा हो जाता है जिससे पर्वत पर उच्च वायुदाब उत्पन्न होता है एवं घाटी पर्वत के अपेक्षा अधिक गर्म होती जिससे घाटी में निम्न वायुदाब उत्पन्न हो जाता है, फलस्वरूप रात्रि में पर्वतीय ढालान से ठंडी पवनें घाटी की ओर बहने लगती है जिसे पर्वत समीर कहा जाता है।
स्थनीय पवन( Local Wind)
- पृथ्वी के किसी भी भाग में वहाँ के स्थानीय परिस्थिति के कारण बहनें वाली पवन को स्थानीय पवन कहते है।यह कई प्रकार की होती है।
- चिनुक- चिनुक का शाब्दिक अर्थ हिम खाने वाला होता है। यह पवन गर्म होता है जो संयुक्त राज्य अमेरिका एवं कनाडा में राँकी पर्वत के ढालानों पर चलता है। इस पवन के बहने से शरद ऋतू में बर्फ को पिघला देती है जिससे वहाँ के चारागाह बर्फ विहीन हो जाती है जिससे वहाँ के पशुपालकों को अपने पशुओं के लिये चारा उपलब्ध हो जाती है।
- फाँन- फाँन पवन भी गर्म एवं शुष्क है। यह पवन उत्तरी आँल्पस पर्वत से नीचे ढालों की ओर बहती है। इस पवन का स्वीटजरलैंड में सर्वाधिक प्रभाव रहता है। इस पवन के प्रभाव से बर्फ पिघल जाया करती है एव पशुपालकों को अपने पशुओं के लिए चारा उपलब्ध हो जाता है। इस पवन के प्रभाव के कारण अंगूर जल्द पक जाया करता है।
- सिराँको- यह पवन सहारा मरूस्थल से भूमध्यसागर की ओर बहती है। यह पवन गर्म एवं शुष्क होती है। यह पवन भूमध्यसागर पार करने के अवस्था में आर्द्र हो जाती है एवं इटली तक पहुंच जाती है। इस पवन को विभिन्न देशों में विभिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे- लीबिया में गिबिली, मिस्र में खमसिन, इटली में सिराँको, ट्यूनिशिया में चिली, स्पेन में लेबेक, मैड्रिया में लेस्ट।
- हरमाटन- हरमाटन पवन सहारा मरूस्थल से उत्तर- पूर्व दिशा की ओर बहती है। यह पवन भी गर्म एवं शुष्क होती है। यह पवन गुआना तक बहती है एवं वहाँ के लिए स्वास्थ्यवर्धक हो जाया करती है जिससे गुआना में हरमाटन पवन को डाँक्टर पवन कहा जाता है।
- ब्लिजार्ड- इस पवन को हिम झंझावात के नाम से भी जाना जाता है। यह ठंडा पवन है जिसके बहने से मेघो से हिम वर्षा होती है। इस पवन का प्रभाव संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, अंटार्कटिका महाद्विप में होता है।
- सिमूम- अरब रेगिस्तान में बहने वाली पवन है जो गर्म एवं शुष्क होती है। इस पवन का तापमान 40° सेन्टीग्रेड से 59° सेन्टीग्रेड तक होता है।
- ब्रिक फील्डर- यह पवन ग्रीष्म कालीन ऋतू में बहा करती है जिससे यह गर्म एवं शुष्क होती है। यह पवन मुख्य रूप से आस्ट्रेलिया के आंतरिक प्रांत विक्टोरिया में बहा करती है।
- पुरगा – यह पवन साइबेरिया में बहने वाली ठंडी पवन है।
- मिस्ट्रल- मिस्ट्रल एक ठंडी पवन है जिसका प्रभाव फ्रांस की रोन घाटी एवं उसके डेल्टा क्षेत्रों में रहता है।
- ब्लैक रोलर- यह पवन उत्तरी अमेरिका महाद्विप के मैदानों में उत्तर- पश्चिमी या दक्षिण- पश्चिमी तेज बहने वाली आँधी होती है।
- कोयमबैंग- यह पवन इंडोनेशिया एव जावा द्विप में बहने वाली पवन है जो गर्म एवं शुष्क होती है। इस पवन के बहने से इन क्षेत्रों में तम्बाकू की खेती को नुकसान होती है।
- शामल-यह मुख्य रूप से इराक एवं फारस की खाडी में बहने वाली पवन है जो गर्म एवं शुष्क होती है।
- नारवेस्टर- यह न्यूजीलैंड में बहने वाली गर्म एवं शुष्क पवन है जो उच्च पर्वतीय ढालानों से नीचे की ओर बहती है।
- साण्टा आना- यह दक्षिण कैलीफोर्निया के साण्टा आना घाटी में बहनें वाली आँधी है जो गर्म एवं शुष्क पवन है।
- विलि- विलि- यह पवन आस्ट्रेलियाके उत्तरी – पश्चिमी तट पर बहने वाली आंधी है। यह ऊष्ण कटिबंधीय तीव्र तूफानी पवन भी कहलाती है।
- स्थानीय गर्म हवाएं एवं प्रभावित क्षेत्र –
गर्म हवा – प्रभावित क्षेत्र
जोन्डा – अर्जेन्टीना
वर्गस – दक्षिण अफ्रीका
हबूब – उत्तर- पूर्व सूडान
सुखोवे – रूस
सुखोवे – कजाखस्तान
गारिच – दक्षिण- पूर्वी ईरान
बाग्यो – फिलीपींस द्वीप समूह
अयाला – फ्रांस
बर्ग – उत्तरी आल्पस पश्चिम अफ्रीका
ट्रैमोण्टेन – मध्य यूरोप
कराबर्न – चीन सिक्यांग
सामून – ईरान
सोलानो – स्पेन के तट
लू – उत्तरी भारत
- स्थानीय ठंडी हवाएं एवं प्रभावित क्षेत्र –
ठंडी हवा – प्रभावित क्षेत्र
विलीवाव – अलास्का
ग्रीगेल – भूमध्यसागर
मिस्ट्रल – स्पेन एवं फ्रांस
बाइज – दक्षिण फ्रांस
नार्दर – संयुक्त राज्य अमेरिका
फ्रियाजेम – ब्राजील
नार्टी – संयुक्त राज्य अमेरिका
पैपागायो – मैक्सिको
नेवाडाँस – इक्वेडोर
सीस्टान – पूर्वी ईरान
बोरा – एड्रियाटिक तट
पैम्पेरो – अर्जेंटीना, उरूग्वे
बुरान – सोवियत रूस एवं साइबेरिया
फाइजेम – ब्राजील
पैम्पीरो – अर्जेण्टाइना
पापागायो – मैक्सिको
नार्दर – संयुक्त राज्य अमेरिका
पोनेण्टी – दक्षिण अफ्रीका
दक्षिण बस्र्टर – दक्षिण- पूर्व आस्ट्रेलिया
मैस्ट्रेल – उत्तरी इटली
पुर्गा – टुण्ड्रा प्रदेश
पोनन्त – फ्रांस एवं कोर्सिक तट
- चक्रवात- चक्रवात की उत्पति वायुराशियों के मिश्रण के फलस्वरूप होती है। जब वायु किसी एक केन्द्र बिन्दु पर कम वायुदाब के कारण बाहर से बवंडर के रूप अंदर की ओर तेजी से बहता है तो चक्रवात उत्पन्न होता है। उत्तरी गोलार्द्व में चक्रवात में पवन की दिशा घडी की सुई की विपरीत दिशा में होती है जिसे वामावर्त कहा जाता है। दक्षिणी गोलार्द्व में चक्रवात में पवन की दिशा घडी के सुई की सामान दिशा में होती है जिसे दक्षिणावर्त कहा जाता है। चक्रवात के कारण हवा का बहाव केन्द्र की तरफ होता है और यह हवा केन्द्र से ऊपर की ओर उठती है एवं वर्षा होती है। चक्रवात दो प्रकार के होते है- शीतोष्ण चक्रवात एवं उष्ण कटिबंधीय चक्रवात।
- शीतोष्ण चक्रवात- शीतोष्ण चक्रवात पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है। यह चक्रवात पछुआ पवन की पेटी में 30° अक्षांश से 35° अक्षांश के बीच उत्पन्न होती है।
- उष्ण कटिबंधीय चक्रवात – इस चक्रवात का क्षेत्र 23.5° उत्तर कर्क से 23.5° दक्षिण मकर तक होता है। उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का केन्द्रीय भाग शांत क्षेत्र कहा जाता है।
- टायफून- पश्चिमी प्रशांत महासागर की चक्रवात एवं चीन सागर में उठने वाली चक्रवात को टायफून चक्रवात कहा जाता है। इस चक्रवात के कारण भारी वर्षा होती है। टायफून की गति 160 किलोमीटर प्रति घंटा की होती है।
- टारनेडो- यह बहुत ही निम्न वायुदाब के कारण चक्रवात आता है जो बहुत ही छोटा एवं भयंकर होता है इसी चक्रवात को टारनेडो कहा जाता है। इस चक्रवात का प्रभाव आस्ट्रेलिया एवं संयुक्त राज्य अमेरिका में होता है। यह चक्रवात स्थल के साथ ही जल में उत्पन्न होता है। गस चक्रवात की गति 350 किलोमीटर प्रति घंटा की होती है।
- हरीकेन- यह चक्रवात अटलांटिक महासागर में उठते रहता है। इस चक्रवात की गति 150 किलोमीटर प्रति घंटा तक होती है।
- प्रतिचक्रवात- जब किसी भी विशेष स्थान के केन्द्र पर वायुदाब अधिक हो एवं बाहर में निम्न वायुदाब हो तो वहाँ पर हवा केन्द्र से बाहर की ओर बहती है जिससे मौसम साफ रहता है इसे ही प्रतिचक्रवात कहा जाता है।
