Development of the Indian Constitution (भारतीय संविधान का विकास )
- भारत में ब्रिटेन के कुछ व्यापारियों ने व्यवसाय के उद्देश्य से ब्रिटेन में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना किये।
- ईस्ट इंडिया कंपनी को ब्रिटेन की सरकार से 1600 ईस्वीं में चार्टर पत्र प्राप्त हो गया।
- 1600 ई. से ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में व्यापार करने लगी।
- ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार करने लगी परंतु 1707 ई. में मुगल शासक औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात जब शासन कमजोर होने लगा तब कंपनी भारत में व्यापार के साथ साथ शासन व्यवस्था में हस्तक्षेप करने लगी।
- भारत में कंपनी व्यापार के साथ अब मजबूत स्थिति बनाने लगी और बंगाल में 1757 की प्लासी की युद्ध में अपनी रणनीति से युद्ध को जीत कर अपने पक्ष का नबाब बना दिया।
- 1764 ई. की बक्सर युद्ध के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी अप्रत्यक्ष रूप से बंगाल में शासन करने लगी और भारत में शासन के लिए ब्रिटेन की सरकार कानून का निर्माण करने लगी।
1773 ई. का रेग्यूलेटिंग एक्ट
- ब्रिटेन की सरकार द्वारा भारत के लिए पहला रेग्यूलेंटिंग एक्ट बनाया गया।
- इस एक्ट का प्रमुख उद्देश्य कंपनी में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना था।
- इस एक्ट से पूर्व तीन प्रेसीडेन्सियों में तीन गवर्नर थे, अब मद्रास एवं बम्बई प्रेसीडेन्सियों को कलकत्ता प्रसेडेन्सी के अधीन किया गया एव बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा।
- इस एक्ट से कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट का स्थापना किया गया।
- इस समय बंगाल का गवर्नर जनरल वाँरेन हेस्टिंग्स था।
1784 का पिट्स इंडिया एक्ट
- यह एक्ट व्यापारिक मामलों एवं राजनीतिक मामलों को अलग कर दिया।
- व्यापारिक मामलों के लिए बोर्ड आँफ डायरेक्टर्स बनाया गया जबकि राजनीतिक मामलों के लिए बोर्ड आँफ कंट्रोलर की स्थापना किया गया।
- यह एक्ट भारत में द्वैध शासन पद्धति को जन्म दिया जो 1858 ई. तक बना रहा।
1793 का चार्टर एक्ट
- इस एक्ट से बोर्ड आँफ कंट्रोल के अधिकारीयों एवं कर्मचारियों का वेतन भारतीय राजकोष से दिया जाने लगा।
- इस एक्ट से कंपनी को 20 वर्ष के लिए व्यापार की अवधि को बढा दिया गया।
1813 का चार्टर एक्ट
- इस एक्ट से कंपनी को 20 वर्ष के लिए व्यापार की अवधि को बढा दिया गया।
- इस एक्ट से भारतीय व्यापार के लिए मिले एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया।
- इस एक्ट से ईस्ट इंडिया कंपनी को केवल चीन एवं चाय के व्यापार का एकाधिकार दे दिया गया।
- इस एक्ट से से भारतीय सीमाओं के अधिन ब्रिटेन के अन्य नागरिकों को व्यापार की अनुमति दे दी गई।
1833 का चार्टर एक्ट
- इस एक्ट ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापार का एकाधिकार पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया गया
- इस एक्ट से कंपनी को अब केवल राजनीतिक कार्य का अधिकार दिया गया।
- इस एक्ट द्वारा भारतीय शासन का केन्द्रीयकरण कर दिया गया।
- इस एक्ट से बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा।
- बंगाल के गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक को भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया
- इस एक्ट से भारत में विधि आयोग की नियुक्ति किया गया।
- इस एक्ट से गवर्नर जनरल की सरकार को भारत सरकार कहा जाने लगा एवं उसकी परिषद् को भारत परिषद् कहा जाने लगा।
1853 का चार्टर एक्ट
- इस एक्ट से बंगाल के लिए अलग से लेफ्टिनेंट गवर्नर जनरल नियुक्त किया जाने लगा।
- इस एक्ट से विधायी परिषद् को कार्यकारी परिषद् से अलग कर दिया गया।
- इस एक्ट से विधानमंडल की स्थापना किया गया।
- इस एक्ट से भारत में सेवा के लिए प्रतियोगिता परिक्षा के आधार पर नियुक्त करने की व्यवस्था किया गया।
1858 का भारत शासन अधिनियम
- यह एक्ट 1853 ई. के चार्टर एक्ट के 5 वर्ष बाद ही आ गया, क्योंकि 1857 ई. में भारत के स्वतंत्रता की प्रथम विद्रोह हो गया।
- इस एक्ट के परिणामस्वरूप यह हुआ कि भारत पर शासन करने के अधिकार को ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर सीधा ब्रिटिश क्राउन को सौंप दिया गया।
- इस एक्ट के आने से 1784 ई. के पिट्स इंडिया एक्ट द्वारा चल रही द्वैध शासन समाप्त कर दिया गया।
- ब्रिटेन में भारत मंत्री पद का सृजन किया गया।
- अब भारत में शासन व्यवस्था सीधे ब्रिटिश संसद द्वारा नियंत्रित हो गया।
- भारत परिषद् के नाम से एक 15 सदस्यों के परिषद् का गठन किया गया।
- इस एक्ट से भारत के गवर्नर जनरल को वायसराय कहा जाने लगा, वायसराय ब्रिटिश क्राउन का प्रतिनिधि हुआ करता था।
- 1858 ई. में लार्ड कैनिंग जो भारत के गवर्नर जनरल थे अब प्रथम वायसराय नियुक्त हो गये।
1861 का भारत शासन अधिनियम
- इस अधिनियम से गवर्नर जनरल के कार्यकारिणी परिषद् में एक सदस्य बढा कर 5 सदस्य कर दिया गया।
- गवर्नर जनरल के कार्यकारिणी परिषद का यह पांचवा सदस्य विधिवेत्ता का पद था।
- इस एक्ट द्वारा गवर्नर जनरल को पहली बार अध्यादेश जारी करने करने की शक्ति प्राप्त हुई।
- इस एक्ट से अब गवर्नर जनरल को यह अधिकार प्राप्त हुआ कि वह बंगाल, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत एवं पंजाब में विधान परिषद का स्थापना कर सकें।
- इस एक्ट से पहली बार भारत में विभागीय प्रणाली,मंत्रीमंडलीय व्यवस्था एवं प्रतिनिधि संस्थाओं का प्रारंभ हुआ।
1892 ई. का भारत शासन अधिनियम
- इस एक्ट से भारत में अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली की शुरुआत हुई।
- इस एक्ट से गवर्नर जनरल की परिषद में अतिरिक्त सदस्यों की को बढा कर अधिकतम 16 एवं न्यूनतम 10 कर दिया गया।
- इस एक्ट से परिषद के सदस्यों द्वारा बजट पर बहस करने एवं कार्यकारिणी से प्रश्न पूछने की शक्ति प्रदान की गई।
1909 ई. का भारत शासन अधिनियम
- इस अधिनियम को मार्ले-मिन्टो सुधार अधिनियम भी कहा जाता है।
- इस अधिनियम द्वारा भारतीयों को प्रशासन एवं विधि निर्माण में प्रतिनिधित्व दिया गया।
- इस अधिनियम द्वारा भारत में पहली बार मुस्लिम समुदाय के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की सुविधा का उपबन्ध किया गया
- इस अधिनियम द्वारा भारतीयों को गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में नियुक्ति प्रदान की गई।
- इस अधिनियम द्वारा केन्द्रीय एवं प्रान्तीय विधान परिषदों के सदस्यों को बजट पर वाद विवाद करने, सार्वजनिक हितों पर प्रश्न करने, पूरक प्रश्न करने, मत देने का अधिकार प्रदान किया गया।
- इस अधिनियम द्वारा विधान परिषदों की संख्या में वृद्धि कर दी गई।
1919 ई. का भारत शासन अधिनियम
- इस अधिनियम को मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार अधिनियम कहा जाता है।
- इस अधिनियम द्वारा विधान परिषदों में द्विसदनात्मक व्यवस्था स्थापित की गई।
- उच्च सदन को राज्यपरिषद एवं निम्न सदन को केन्द्रीय विधानसभा कहा गया
- राज्यपरिषद के सदस्यों की संख्या 69 थी, जिनमें निर्वाचित सदस्यों की संख्या 34 थी एवं इन सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्षों का था।
- केन्द्रीय विधानसभा का कार्यकाल 3 वर्षों का था, इसकी सदस्यों की संख्या 145 थी, इन सदस्यों में 104 सदस्य निर्वाचित एवं 41 सदस्य मनोनीत हुआ करते थे।
- राज्य परिषद एवं केन्द्रीय विधानसभा का अधिकार समान था।
- दोनों सदनों के बीच मात्र एक अन्तर यह था कि बजट की स्वीकृति का अधिकार निचले सदन को था।
- प्रान्तों में द्वैध शासन प्रणाली की शुरुआत की गई।
- इस अधिनियम द्वारा प्रान्तीय विषयों को दो भागों में बाटा गया- आरक्षित विषय तथा हस्तांतरित विषय।
- आरक्षित विषय था- भूराजस्व, वित्त, अकाल सहायता, पुलिस, न्याय, पेंशन, समाचार पत्र, जलमार्ग, छापाखाना, अपराधिक जातियाँ, सिचाई, खान, कारखाना, श्रमिक कल्याण, बिजली, व्याँलर, गैस, मोटर गाडिया, औध्योगिक विवाद, सार्वजनिक सेवाएं छोटे बंदरगाह इत्यादि।
- हस्तांतरित विषय था- शिक्षा, पुस्तकालय, संग्रहालय, चिकित्सा सहायता, स्थानीय स्वायत्त शासन, उध्योग, आबकारी, सार्वजनिक निर्माण, मापतौल, कृषि, लोक स्वास्थ्य, सार्वजनिक मनोरंजन पर नियंत्रण, धार्मिक, अग्रहार दान इत्यादि।
- आरक्षित विषय का प्रशासन गवर्नर अपनी कार्यकारिणी परिषद द्वारा करता था
- हस्तांतरित विषय का प्रशासन प्रान्तीय विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी मंत्रियों द्वारा होता था।
- इस अधिनियम द्वारा लोक सेवा आयोग का गठन किया गया
- इस अधिनियम द्वारा भारत में महालेखा परीक्षक नियुक्त करने का अधिकार भारत सचिव को दिया गया।
1935 ई. का भारत शासन अधिनियम
- यह अधिनियम 2 अगस्त 1935 ई. को बना था।
- यह अधिनियम 1920 ई. के बाद हुए विभिन्न राष्ट्रीय आंदोलन के परिणाम स्वरुप बनाया गया था।
- यह अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अधिनियम में सबसे बडा एवं सबसे जटिल था।
- इस अधिनियम में 14 भाग, 15 परिशिष्ट, 451 धाराएँ एवं 10 अनुसूचियाँ विधमान थी।
- स्वतंत्र भारत का वर्तमान संवैधानिक ढाँचा लगभग 1935 ई. के अधिनियम पर ही आधारित है।
- इस अधिनियम में प्रावधान अखिल भारतीय संघ का गठन करने का था, जिसमें 11 ब्रिटिश प्रान्त, 6 चीफ कमीश्नरीं क्षेत्र एवं सभी देशी रियासतों को शामिल से बनना था।
- इस प्रावधान में देशी रियासतों के लिए अनिवार्य नहीं था बल्कि वैकल्पिक था कि वे संघ में शामिल होते परन्तु देशी रियासते शामिल ही नहीं हुई और अखिल भारतीय संघ की स्थापना नहीं हो सकी।
- इस अधिनियम के परिणाम स्वरुप प्रान्तों में द्वैध शासन को समाप्त कर पूर्ण रूप से उत्तरदायी सरकार का गठन किया गया।
- इस अधिनियम के फलस्वरूप अब केन्द्र की सरकार में द्वैध शासन की व्यवस्था लागु किया गया।
- केन्द्र में सुरक्षा, वैदेशिक संबंध एवं धार्मिक मामला प्रत्यक्ष रूप से गवर्नर जनरल के हाथ में केन्द्रित रखा गया एवं अन्य सभी केन्द्रीय मामलों के लिए मंत्रीमंडल की व्यवस्था की गई जो गवर्नर जनरल को सहायता एवं परामर्श देगे।
- इस अधिनियम से संघीय न्यायलय की स्थापना किया गया जिसका अधिकार क्षेत्र प्रान्तों एंव रियासतों तक था, इस न्यायलय में में एक मुख्य न्यायाधीश एंव दो अन्य न्यायाधीश को शामिल किया गया।
- इस संघीय न्यायलय के विरुद्ध अपील लंदन स्थित प्रिवी कौंसिल को प्राप्त थी।
- इस अधिनियम के अनुसार ब्रिटिश संसद को सर्वोच्च वरियता प्राप्त थी, क्योंकि इस अधिनियम के किसी भी भाग में किसी भी प्रकार का परिवर्तन ब्रिटिश संसद के पास ही था।
- इस अधिनियम में किसी भी प्रकार का परिवर्तन प्रान्तीय विधानमंडल एवं संघीय व्यवस्थापिका द्वारा नहीं किया जा सकता था।
- इस अधिनियम के अनुसार साम्प्रदायिक निर्वाचन पद्धति का और अधिक विस्तार किया गया।
- इस अधिनियम के अनुसार भारत परिषद को समाप्त कर दिया गया।
- इस अधिनियम में अभी भी प्रस्तावना नहीं था।
- इस अधिनियम द्वारा वर्मा को भारत से अलग कर दिया गया एवं अदन को इग्लैंड के औपनिवेशिक कार्यालय के अन्तर्गत किया गया, बरार को मध्य प्रान्त में जोड दिय गया, सिन्ध एवं उडीसा को दो नया प्रान्त बनाया गया।
- इस अधिनियम के फलस्वरूप प्रधानमंत्री ( प्रीमियर) एवं मंत्री ( Minister) जैसे नए शब्द अब प्रयोग में आए।
1947 ई. का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम
- यह अधिनियम भारत के वायसराय लार्ड माउंटबेटन की योजना के फलस्वरूप पारित हुआ।
- इस अधिनियम को भारतीय स्वतंत्रता विधेयक के रूप में 4 जुलाई 1947 ई. को ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत किया गया था जिसके फलस्वरूप यह 18 जुलाई 1947 ई. को पारित हो गया।
- इस अधिनियम में कुल 20 धाराएं थी।
- इस अधिनियम में ही उल्लेख किया गया था कि पूर्ण भारत को विभाजित कर दो अधिराज्य बना दिया जाएगा, एक पाकिस्तान एवं दूसरा भारत
- इस अधिनियम में ही था कि 14 अगस्त 1947 ई. को पाकिस्तान एवं 15 अगस्त 1947 ई. को भारत स्वतंत्र देश बना दिया जाएगा।
- इस अधिनियम में प्रावधान किया गया कि स्वतंत्रता बाद दोनों देश से ब्रिटिश क्राउन का आधिपत्य समाप्त हो जाएगा एवं सत्ता दोनों देश की संविधान सभा को सौंप दिया जाएगा
- दोनों देशों में वहाँ के मंत्रीमंडल की सलाह पर गवर्नर जनरल को नियुक्त किया जाएगा
- संविधान निर्माण तक संविधान सभा ही विधानमंडल के रूप में करेगी।
- ब्रिटेन में भारत मंत्री के पद को समाप्त कर दिया जाएगा क्योंकि अब ब्रिटेन की समाप्ति के बाद इसकी कोई जरुरत नहीं थी।
- स्वतंत्र संविधान निर्माण तक 1935 ई. के भारत शासन अधिनियम द्वारा ही प्रशासन चलता रहेगा।
- देशी रियासतों पर से भी ब्रिटिश आधिपत्य को समाप्त कर दिया गया एवं दोनों आधिराज्यों भारत अथवा पाकिस्तान में से किसी एक में शामिल होने को बोला गया।
- भारत एवं पाकिस्तान के बीच सीमा निर्धारण के लिए सीमा आयोग का गठन किया गया जिसका अध्यक्ष सर रेडक्लिफ को नियुक्त किया गया।
भारतीय संविधान सभा
- स्वतंत्र भारत की शासन व्यवस्था चलाने के लिए संविधान निर्माण करना था जिसके संविधान सभा का गठन किया गया।
- संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन की संस्तुतियों के आधार पर जुलाई 1946 ई. में किया गया।
- संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन प्रान्त के विधानसभा के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से किया गया।
- संविधान सभा में कुल 389 सदस्य थे, जिनमें 292 सदस्य ब्रिटिश भारत के प्रान्तों के, 4 सदस्य चीफ कमिश्नरी क्षेत्रों से एवं 93 सदस्य देशी रियासतों के तरफ से थे।
- जुलाई 1946 ई. में 389 सदस्यों में से 296 सदस्यों के लिए चुनाव कराये गये जिनमें कांग्रेस के 208 सदस्य, मुस्लिम लीग के 73 सदस्य एवं 15 सदस्य अन्य छोटे दल एवं स्वतंत्र रूप से निर्वाचित हुए थे
- इस निर्वाचन में सदस्यों की संख्या प्रान्तों में प्रति 10 लाख की जनसंख्या पर एक सीट के हिसाब से किया गया था
- संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसंबर 1946 ई. को नई दिल्ली में स्थित कौंसिल चैम्बर के पुस्तकालय भवन में हुई थी
- संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष के रूप में डाँ. सच्चिदानंद सिन्हा को चुना गया था।
- मुस्लिम लीग संविधान सभा की प्रथम बैठक का बहिस्कार किया और पाकिस्तान के लिए अलग से संविधान सभा की मांग किया।
- संविधान सभा की बैठक में हैदराबाद रियासत का कोई प्रतिनिधि शामिल नहीं हुआ
- प्रान्तों के लिए हुए निर्वाचन के लिए प्रतिनिधि की संख्या का आधार साम्प्रदायिक रूप से विभाजित किया गया था जैसे 296 प्रतिनिधियों में 213 प्रतिनिधि सामान्य, 79 प्रतिनिधि मुसलमान एवं 4 प्रतिनिधि सिक्ख समुदाय से थे।
- संविधान सभा में महिला प्रतिनिधि की संख्या 9 एवं अनुसूचित जनजाति समुदाय के प्रतिनिधि 33 थे।
- संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष 11 दिसम्बर 1946 को डाँ. राजेंद्र प्रसाद को निर्वाचित किया गया।
- संविधान सभा के उपाध्यक्ष पद पर एच. सी. मुखर्जी एवं संवैधानिक सलाहकार के पद पर बी. एन. राव को नियुक्त किया गया।
- संविधान सभा की कार्यवाही जवाहरलाल नेहरू के उद्देश्य प्रस्ताव पेश करने के साथ हुई जो 13 दिसम्बर 1946 ई. को पेश किया गया था।
- जवाहरलाल नेहरू द्वारा पेश उद्देश्य प्रस्ताव 22 जनवरी 1947 को स्वीकृत हो गया फलस्वरूप संविधान निर्माण के लिए विभिन्न समितियां नियुक्त की गई।
- संविधान सभा द्वारा संविधान निर्माण के लिए 29 अगस्त 1947 ई. को 7 सदस्यों का एक प्रारूप समिति का गठन किया गया जिसके अध्यक्ष डाँ. भीमराव अम्बेडकर बनाये गये
- प्रारूप समिति के अध्यक्ष डाँ. भीमराव अम्बेडकर थे एवं अन्य सदस्य – कन्हैयालाल मणिकलाल मुन्शी, सैय्यद मोहम्मद सादुल्लाह, अल्लादी कृष्णा स्वामी अय्यर, एन. गोपाल स्वामी अय्यर, बी. एल. मित्र ( बाद में इनके स्थान पर एन. माधव राव) एवं डी. पी. खेतान (1948 ई. में इनकी मृत्यु के पश्चात टी. टी. कृष्णमाचारी) थे।
- भारत विभाजन की योजना 3 जून 1947 ई. को स्वीकृत हो जाने भारत के संविधान सभा की सदस्यों की संख्या 324 निर्धारित किया गया जिसमें प्रान्तों से आने वाले सदस्यों की संख्या 235 एवं देशी रियासतों से सदस्यों की संख्या 89 निर्धारित किया गया।
- भारत के विभाजन हो जाने पर संविधान सभा का पुनर्गठन किया गया यह पुनर्गठन 31 अक्टूबर 1947 ई. को किया गया था।
- संविधान सभा के पुनर्गठन के उपरांत 31 दिसम्बर 1947 ई. को सदस्यों की संख्या 299 थी
- प्रारूप समिति द्वारा संविधान के प्रारूप पर अपनी रिपोर्ट संविधान सभा को 21 फरवरी 1948 ई. को पेश किया
- संविधान सभा में संविधान के प्रारूप का प्रथम वाचन 4 नवंबर 1948 ई. से 9 नवंबर 1948 ई. तक चला।
- संविधान सभा में संविधान के प्रारूप का दूसरा वाचन 15 नवंबर 1948 ई. से 17 अक्टूबर 1949 ई. तक चला।
- संविधान सभा में संविधान के प्रारूप का तीसरा वाचन 14 नवंबर 1949 ई. से 26 नवंबर 1949 ई. तक चला।
- संविधान सभा द्वारा तीसरे वाचन सत्र के अंतिम दिन 26 नवंबर 1949 ई. को संविधान को पारित किया गया एवं संविधान को स्वीकार कर लिया गया, इस समय संविधान सभा के 284 सदस्य उपस्थित थे
- संविधान के निर्माण में कुल 6.4 करोड़ रूपये व्यय हुए
- संविधान के निर्माण में 2 वर्ष, 11 महीना एवं 18 दिन लगे थे
- संविधान के प्रारूप पर कुल 114 दिन की चर्चा हुई थी
- संविधान सभा द्वारा पारित संविधान में कुल 22 भाग, 395 अनुच्छेद एवं 8 अनुसूचियाँ थी
- वर्तमान में भारत के संविधान में 25 भाग, 470 अनुच्छेद एवं 12 अनुसूचियाँ विधमान है, परन्तु मुख्य अनुच्छेदों की संख्या 395 ही गिनी जाती है, संसोधन से अनुच्छेदों की संख्या बढ गयी है।
- संविधान के कुल 15 अनुच्छेद, जैसे- अनुच्छेद 5,6,7,8,9,60,324,366,367,372,380,388,391,392 एवं 393 को 26 जनवरी 1949 ई. को ही लागू कर दिया गया।
- जबकि शेष बचे हुए अनुच्छेदों को भारत के प्रथम गणतंत्र दिवस के अवसर पर 26 जनवरी 1950 ई. को लागू किया गया।
- संविधान सभा की अंतिम बैठक 24 जनवरी 1950 ई. को किया ।
संविधान सभा द्वारा गठित प्रमुख समितियां एवं उनके अध्यक्ष-
| समिति | अध्यक्ष |
|---|---|
| संचालन समिति | डाँ. राजेन्द्र प्रसाद |
| प्रारूप समिति | डाँ. भीमराव अम्बेडकर |
| नियम समिति | डाँ. राजेन्द्र प्रसाद |
| वित्त एवं कर्मचारी समिति | डाँ. राजेन्द्र प्रसाद |
| संघ संविधान समिति | जवाहरलाल नेहरू |
| प्रांतीय संविधान समिति | सरदार वल्लभभाई पटेल |
| संघ शक्ति समिति | जवाहरलाल नेहरू |
| सलाहकार समिति | सरदार वल्लभभाई पटेल |
( सलाहकार समिति की दो उपसमितियाँ भी थी)
| समिति | अध्यक्ष |
|---|---|
| 8(क) मूल अधिकार उपसमिति | जे. बी. कृपलानी |
| 8(ख) अल्पसंख्यक उपसमिति | एच. सी. मुखर्जी |
- कैबिनेट मिशन में कुल तीन सदस्य – सर स्टेफोर्डक्रिप्स, लाँर्ड पेंथिकलारेंस ए. बी. एलेग्जेण्डर थे।
- कैबिनेट मिशन के 1945 ई. के प्रस्ताव पर 2 सितम्बर 1946 ई. में भारत में अन्तरिम मंत्रीमंडल का गठन किया गया।
अंतरिम मंत्रीमंडल –
| मंत्री | विभाग |
|---|---|
| जवाहरलाल नेहरू | मंत्रीमंडल प्रमुख, विदेश एवं राष्ट्रमंडल |
| सरदार वल्लभभाई पटेल | गृह, सूचना एवं प्रसारण |
| बलदेव सिंह | रक्षा |
| डाँ. राजेन्द्र प्रसाद | खाद्य एवं कृषि |
| लियाकत अली खाँ | वित्त |
| आसफ अली | रेल |
| सी. राजगोपालाचारी | शिक्षा |
| जोगेन्दर नाथ मंडल | विधि |
| जगजीवन राम | श्रम |
| जान मथाई | उद्योग एवं आपूर्ति |
| आई. आई. चुन्दरीगर | वाणिज्य |
| सी.एच. भाभा | खान एवं बन्दरगाह |
| अब्दुल रब निश्तार | संचार |
| गजंफर अली खाँ | स्वास्थ्य |
स्वतंत्र भारत का प्रथम मंत्रीमंडल –
| मंत्री | विभाग |
|---|---|
| जवाहरलाल नेहरू | प्रधानमंत्री, विदेश, राष्ट्रमंडल एवं वैज्ञानिक शोध |
| सरदार वल्लभभाई पटेल | गृह, राज्य एवं सूचना प्रसारण ( 23 अगस्त 1947 ई. से उप-प्रधानमंत्री) |
| आर. के. चेट्टी | वित्त |
| अबुल कलाम आजाद | शिक्षा |
| डाँ. राजेन्द्र प्रसाद | खाद्य एवं कृषि |
| रफी अहमद किदवई | संचार |
| डाँ. भीमराव अम्बेडकर | विधि |
| डाँ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी | उद्योग एवं आपूर्ति |
| राजकुमारी अमृत कौर | स्वास्थ्य |
| जगजीवन राम | श्रम |
| सी. एच. भाभा | वाणिज्य |
| एन. वी. गाडगिल | कार्य, खदान एवं ऊर्जा |
भारतीय संविधान के विदेशी स्रोत
- भारतीय संविधान के अधिकांश भाग या दो तिहाई भाग 1935 ई. के भारत शासन अधिनियम से लिया गया है।
- भारत के संविधान के 395 अनुच्छेद में से लगभग 250 अनुच्छेद पूर्ण रूप से या आंशिक रुप से भारतीय संविधान में समाहित है, शेष अनुच्छेद विभिन्न देशों के संविधान से लिए गए है
- भारतीय संविधान में जो विदेशी संविधान से सहायता ली गई है वह निम्न है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका–संविधान की सर्वोच्चता, निर्वाचित राष्ट्रपति एवं उस पर महाभियोग की प्रक्रिया, राष्ट्रपति में संघीय कार्यपालिका शक्ति, उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा में पदेन सभापति,मौलीक अधिकार, सर्वोच्च न्यायलय, न्यायिक पुनरावलोकन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, सर्वोच्च न्यायलय एवं उच्च न्यायलय के न्यायाधीशों की हटाने की विधि, वित्तीय आपात।
- आस्ट्रेलिया– प्रस्तावना की भाषा, सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची का प्रावधान, केन्द्र एवं राज्यों के मध्य के संबंध और शक्तियों का विभाजन।
- ब्रिटेन– संसदीय शासन प्रणाली, एकल नागरिकता, विधि का शासन, विधि निर्माण का प्रक्रिया,संसदीय विशेषाधिकार, द्विसदनात्मक व्यवस्था, चुनाव में सर्वाधिक मत के आधार पर जीत
- आयरलैण्ड– राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत,राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल की व्यवस्था तथा निर्वाचन पद्धति, आपातकालीन उपबंध, राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा में साहित्य, समाज सेवा, कला एवं विज्ञान के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त व्यक्तियों का मनोनयन।
- रूस– मौलिक कर्त्तव्यों का प्रावधान।
- जर्मनी– आपातकाल के लागू होने के दौरान राष्ट्रपति को प्राप्त मौलिक अधिकार संबंधी शक्तियां।
- कनाडा–संघीय व्यवस्था, अवशिष्ट शक्तियां केन्द्र सरकार के पास।
- दक्षिणी अफ्रीका–संविधान संशोधन की प्रक्रिया का प्रावधान।
- जापान– विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का व्यवस्था।
भारतीय संविधान की अनुसूची
- प्रथम अनुसूची- प्रथम अनुसूची में भारत के 29 राज्यों एवं 7 संघशासित क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है।
- द्वितीय अनुसूची – द्वितीय अनुसूची में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यसभा के सभापति, लोकसभा एवं विधानसभा के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष, उच्चतम एवं उच्च न्यायलय के न्यायधीश, नियंत्रक महालेखा परीक्षक इत्यादि पदाधिकारियों के वेतन, भत्ते, पेंशन इत्यादि का उल्लेख है
- तृतीय अनुसूची – तृतीय अनुसूची में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, न्यायधीश, मंत्री, सांसद, विधायक इत्यादि द्वारा शपथ लेने की प्रक्रिया का उल्लेख है।
- चौथी अनुसूची – इस अनुसूची में राज्यों एवं संघशासित क्षेत्रों से आने वाले राज्यसभा सदस्यों की संख्या का उल्लेख किया गया है।
- पाँचवी अनुसूची – इस अनुसूची में अनुसूचित क्षेत्रों एवं अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन एवं नियंत्रण के प्रावधान का उल्लेख किया गया है।
- छठी अनुसूची – इस अनुसूची में असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिजोरम राज्यों राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में उल्लेख किया गया है
- सातवीं अनुसूची – सातवीं अनुसूची में केन्द्र एवं राज्य सरकारों के बीच विधि निर्माण का उल्लेख किया गया है। इस अनुसूची के तीन सूचि है जिसपर केन्द्र एवं राज्य कानून निर्माण करती है ये अनुसूची है- संघ सूची, राज्य सूची तथा समवर्ती सूची।
(1) संघ सूची- इस सूची में दिए गए विषय पर केवल केन्द्र की सरकार ही कानून बना सकती है। इस सूची कुल 97 विषय थे जिसमें अब वर्तमान में 99 विषय सम्मिलित है।
(2) राज्य सूची – इस सूची में शामिल विषय पर राज्य सरकारें कानून बनाती है परन्तु राष्ट्रीय हित का मामला आने पर केन्द्र भी कानून बना सकती है। इस सूची में कुल 66 विषय थे जो वर्तमान में 61 विषय है।
(3) समवर्ती सूची – इस सूची में वर्णित विषय पर केन्द्र एवं राज्य दोनों सरकारें कानून बना सकती है परन्तु अगर इस सूची में शामिल विषय पर राज्य सरकार कानून बनाती है एवं उसी विषय पर केन्द्र की सरकार कानून बना देती है तो राज्य सरकार द्वारा निर्मित कानून समाप्त हो जाएगा एवं केन्द्र द्वारा निर्मित कानून रह जाएगा। इस सूची में कुल 47 विषय थे जो वर्तमान में 52 विषय है। - आठवीं अनुसूची – इस अनुसूची में भाषाओं का उल्लेख किया गया है।
- नौवीं अनुसूची – इस अनुसूची को 1951 ई. में प्रथम संविधान संशोधन द्वारा जोडा गया। इस अनुसूची में 284 अधिनियम है जिसे न्यायलय में चुनौती नहीं दिया जा सकता है। इस अनुसूची में भूमि सुधार संबधी अधिनियम का प्रावधान है।
- दसवीं अनुसूची – इस अनुसूची को 1985 ई. में 52वें संविधान संशोधन द्वारा जोडा गया। इस अनुसूची में दल-बदल से संबंधित कानून का उल्लेख किया गया है।
- ग्यारहवीं अनुसूची – इस अनुसूची को 1993 ई. के 73वें संविधान संशोधन द्वारा जोडा गया है। इस अनुसूची में पंचायतीराज संस्थाओं की शक्तियां एवं कार्य से संबंधित विषयों का उल्लेख किया गया है।
- बारहवीं अनुसूची – इस अनुसूची को 1993 ई. के 74वें संविधान संशोधन द्वारा जोडा गया है। इस अनुसूची में नगरनिकाय संस्थाओं की शक्तियां एवं कार्य से संबंधित विषयों का उल्लेख किया गया है।
भारतीय संविधान के भाग
| भाग | संविधान |
|---|---|
| भाग 1 | भारत संघ एवं उसका राज्य क्षेत्र (अनुच्छेद 1 से अनुच्छेद 4 ) |
| भाग 2 | नागरिकता ( अनुच्छेद 5 से अनुच्छेद 11 ) |
| भाग 3 | मौलिक अधिकार ( अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35) |
| भाग 4 | राज्य के नीति-निर्देशक तत्व ( अनुच्छेद 36 से अनुच्छेद 51) |
| भाग 5 | संघ ( अनुच्छेद 52 से अनुच्छेद 151) |
| भाग 6 | राज्य ( अनुच्छेद 152 से अनुच्छेद 237) |
| भाग 7 | पहली अनुसूची के भाग ख के राज्य ( अनुच्छेद 238) |
| भाग 8 | संघ राज्यक्षेत्र ( अनुच्छेद 239 से अनुच्छेद 242) |
| भाग 9 | पंचायत ( अनुच्छेद 243) |
| भाग 10 | अनुसूचित एवं जनजातीय क्षेत्र ( अनुच्छेद 244 एवं अनुच्छेद 244 क) |
| भाग 11 | संघ एवं राज्यों के मध्य संबंध ( अनुच्छेद 245 से अनुच्छेद 263 ) |
| भाग 12 | वित्त, संपत्ति, वाद एवं संविदाए ( अनुच्छेद 264 से अनुच्छेद 300 क) |
| भाग 13 | भारत के राज्यों के भीतर व्यापार, वाणिज्य एवं समागम ( अनुच्छेद 301 से अनुच्छेद 307) |
| भाग 14 | संघ एवं राज्यों के अधीन सेवाएं ( अनुच्छेद 308 से अनुच्छेद 323) |
| भाग 15 | निर्वाचन ( अनुच्छेद 324 से अनुच्छेद 329) |
| भाग 16 | कुछ वर्गों से संबंधित विशेष उपबंध ( अनुच्छेद 330 से 342) |
| भाग 17 | राजभाषा ( अनुच्छेद 343 से अनुच्छेद 351) |
| भाग 18 | आपात उपबंध ( अनुच्छेद 352 से अनुच्छेद 360) |
| भाग 19 | प्रकीर्ण ( राष्ट्रपति, राज्यपाल, संसद इत्यादि के संरक्षण )( अनुच्छेद 361 से अनुच्छेद 367) |
| भाग 20 | संविधान संशोधन ( अनुच्छेद 368) |
| भाग 21 | अस्थाई, संक्रमणकालीन एवं विशेष उपबंध ( अनुच्छेद 369 से अनुच्छेद 392) |
| भाग 22 | संक्षिप्त नाम एवं निरसन ( अनुच्छेद 393 से अनुच्छेद 395) |
संघ एवं उसका राज्यक्षेत्र
- अनुच्छेद 1 – यह अनुच्छेद में उल्लेखित है कि भारत अर्थात इण्डिया राज्यों का संघ होगा। संघ के राज्य क्षेत्र, राज्यों के राज्य क्षेत्र एवं ऐसे अन्य क्षेत्र जो अर्जित किये गये हो समाविष्ट होगे। संघ राज्य क्षेत्र एवं राज्यों के राज्य क्षेत्र के नाम एवं उसके अन्तर्गत आने वाले क्षेत्रों का वर्णन संविधान की पहली अनुसूची में वर्णित है। इस समय पहली अनुसूची में 29 राज्य एवं 7 संघ राज्य क्षेत्र शामिल है।
- अनुच्छेद 2 – इस अनुच्छेद में उपबंध है कि संसद विधि द्वारा ऐसे निबन्धोँ एवं शर्तों पर जो वह ठीक समझें, संघ में नये राज्यों का प्रवेश या नये उनकी स्थापना कर सकती है
- अनुच्छेद 3 – इस अनुच्छेद में उपबंध है कि संसद नये राज्यों का निर्माण कर सकती है, किसी भी राज्य के किसी अन्य राज्य में मिला सकती है, किसी भी राज्य के क्षेत्र को बढा या घटा सकती है, किसी भी राज्य की सीमाओं में परिवर्तन कर सकती है, किसी भी राज्य के नाम में परिवर्तन कर सकती है
- अनुच्छेद 4 – अनुच्छेद 2 एवं अनुच्छेद 3 के अधीन निर्मित किसी भी प्रकार के कानून को साधारण विधायी प्रक्रिया एवं साधारण बहुमत द्वारा पारित किया जाएगा।
राज्यों का पूनर्गठन
- भारत जब स्वतंत्र हो रहां था तो उस समय भारत में दो प्रकार की राजनीतिक इकाईयां थी एक ब्रिटिश प्रांत एवं दूसरा देशी रियासत।
- देशी रियासतों के भारत में विलय में महत्वपूर्ण भूमिका सरदार वल्लभ भाई पटेल एवं वी. पी. मेनन ने निभाई थी।
- देशी रियासतों को भारत में विलय के लिए रियासती मंत्रालय का गठन सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में किया गया था।
- देशी रियासत जूनागढ़ को जनमत के आधार पर भारत में विलय कराया गया।
- हैदराबाद रियासत को पुलिस कार्रवाई कर भारत में विलय करवाया गया।
- जम्मू कश्मीर रियासत को विलय-पत्र पर हस्ताक्षर के उपरांत भारत में विलय कराया गया।
- राज्यों के पूनर्गठन को भाषा के आधार पर करने के लिए संविधान सभा के अध्यक्ष डाँ. राजेन्द्र प्रसाद ने इलाहाबाद उच्च न्यायलय के सेवानिवृत न्यायाधीश न्यामूर्ति एस.के. धर के की अध्यक्षता में चार सदस्यीय आयोग का गठन किया।
- इस आयोग ने सिफारिश दी कि राज्यों का पूनर्गठन भाषा के आधार पर न करके प्रशासनिक सुविधा के आधार पर किया जाए।
- धर आयोग की सिफारिश की परिक्षा के लिए कांग्रेस कार्यसमिति के जयपुर के अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल एवं पट्टाभि सीतारमैय्या की एक समिति का गठन किया।
- इस समिति ने भी धर आयोग की सिफारिश को माना एवं भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की माँग को खारिज कर दिया।
- भाषा के आधार पर तेलुगु भाषियों के लिए अलग राज्य की मांग को लेकर रामुल्लू ने आमरण अनशन किया था एवं 56 दिन के आमरण अनशन के बाद रामुल्लू की निधन हो गयी
- रामुल्लू के निधन हो जाने के कारण तेलगु भाषियों के लिए 1 अक्टूबर 1953 ई. को आन्ध्रप्रदेश का गठन कर दिया गया।
- यह स्वतंत्रता के बाद भाषा के आधार पर बनने वाला प्रथम राज्य था।
- राज्यों के पुनर्गठन के लिए 22 दिसंबर 1953 ई. को राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया।
- राज्य पुनर्गठन आयोग के अध्यक्ष फजल अली एवं सदस्य पंडित हृदयनाथ कुंजरू एवं सरदार के. एम. पणिक्कर थे
- राज्य पुनर्गठन अधिनियम को संसद द्वारा जुलाई 1957 ई. में पारित कर दिया गया।
- राज्य पुनर्गठन अधिनियम के तहत भारत में 14 राज्य एवं 6 केन्द्र शासित प्रदेश का गठन किया गया।
- स्वतंत्र भारत के 14 राज्य – आन्ध्रप्रदेश, असम, बिहार, बंबई,जम्मू-कश्मीर,मध्यप्रदेश, मद्रास, मैसूर, केरल, राजस्थान, पंजाब, उडीसा, उत्तरप्रदेश एवं पश्चिम बंगाल थे।
- स्वतंत्र भारत के 6 केन्द्र शासित प्रदेश – दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, लक्षद्वीप, अंडमान निकोबार द्वीप समूह, त्रिपुरा, मणिपुर थे
- वर्तमान समय में भारत में कुल 28 राज्य एवं 8 केन्द्र शासित प्रदेश शामिल है।
नागरिकता
भाग-2, अनुच्छेद 5 से अनुच्छेद 11
- भारत के नागरिकों को एकल नागरिकता प्राप्त है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका एवं स्वीटजरलैंड में दोहरी नागरिकता का प्रावधान है, राष्ट्र के लिए अलग नागरिकता एवं राज्यों के लिए अलग नागरिकता, परन्तु पुरे भारतवर्ष के नागरिकों को एक समान नागरिकता प्राप्त है।
भारत में भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 ई. के अनुसार नागरिकता प्राप्त की जा सकती है–
- जन्म द्वारा नागरिकता – वह व्यक्ति जिसका जन्म 26 जनवरी 1950 ई. के पश्चात हुआ हो, वह भारत का नागरिक होगा। परन्तु वैसे व्यक्ति जिनका जन्म 26 जनवरी 1950 ई. को हुआ है परन्तु वह विदेशी है या राजनयिक के बच्चे है तो उन्हें नागरिकता नहीं मिलेगी।
- वंश के द्वारा नागरिकता – 26 जनवरी 1950 ई. के पश्चात भारत के बाहर जन्म लेने वाला व्यक्ति भी नागरिक माना जाएगा, यदि व्यक्ति के जन्म लेने के समय उसके माता पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक हो। माता भारतीय हो तब कोई व्यक्ति भारत से बाहर जन्म लेता है तो भी भारतीय माना जाएगा यह व्यवस्था भारतीय नागरिकता संशोधन अधिनियम 1992 ई. द्वारा लागु किया गया है।
- पंजीकरण द्वारा प्राप्त नागरिकता – वैसे व्यक्ति जो जन्म से भारत के नागरिक नहीं हो वे पंजीकरण के द्वारा कुछ शर्तों के साथ नागरिकता प्राप्त कर सकते है जैसे- व्यक्ति पंजीकरण के आवेदन से छः माह पूर्व से भारत में रह रहे हो, वैसी महिला जो भारत में विवाह की हो, राष्ट्रमंडल देशों के वैसे नागरिक जो भारत में रहते हो और नागरिकता प्राप्त करना चाहते हो।
- देशीयकरण द्वारा नागरिकता – जब कोई विदेशी व्यक्ति का देशीयकरण के लिए आवेदन भारत सरकार द्वारा स्वीकृत कर लिया जाता है तब वह व्यक्ति भारत का नागरिक बन जाता है।
- क्षेत्र विस्तार द्वारा नागरिकता – भारत सरकार द्वारा किसी बाहरी क्षेत्र को भारतीय क्षेत्र में समाहित कर लिया जाता है तो उस क्षेत्र के नागरिकों को स्वतः नागरिकता प्राप्त हो जाती है।
भारतीय नागरिकता की समाप्ति – भारतीय नागरिकों की नागरिकता समाप्त हो जाती है।-
- जब कोई व्यक्ति किसी अन्य देश का नागरिकता प्राप्त करना चाहता है तो वह व्यक्ति स्वेच्छा से भारत की नागरिकता को समाप्त कर सकता है।
- जब कोई व्यक्ति किसी अन्य देश की नागरिकता प्राप्त कर लेता है तब वह भारत का नागरिक नहीं रह जाता है।
- कोई व्यक्ति गलत तरीका से नागरिकता प्राप्त कर ली हो या राष्ट्र विरोधी कार्यों में संलिप्त हो तब सरकार द्वारा नागरिकता से वंचित कर दिया जाता है।
भारतीय नागरिकता संशोधन अधिनियम 1986 ई. – भारतीय नागरिकता संशोधन अधिनियम 1955 ई. में संशोधन कर भारतीय नागरिकता संशोधन अधिनियम 1986 ई. लागु किया गया जो है-
- वैसे व्यक्ति जो भारत में जन्म लिया हो वह भारत का नागरिक होगा परन्तु उस व्यक्ति के माता या पिता में से कोई एक को भारत का नागरिक होना चाहिए।
- वैसे व्यक्ति जो पंजीकरण के माध्यम से भारत का नागरिकता प्राप्त करना चाहते है वे अब भारत में 5 वर्ष से निवास करते हो, जिसकी अवधि पहले छः माह हुआ करती थी।
- भारत में अब देशीयकरण द्वारा नागरिकता तभी मिलेगी जब संबंधित व्यक्ति भारत में दस वर्षों से रहता हो पहले यह अवधि 5 वर्ष हुआ करती थी।
